बाहरी दवाओं के बगैर इलाज, न बाबा न

Fatehpur Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
फतेहपुर। सरकारी चिकित्सा सेवाओं का बुरा हाल है। इलाज कराने अस्पताल में घुसे नहीं कि कदम-कदम पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर मरीजों के परिजनों की जेबें ढीली होना तय है। बात हो रही है अस्पताल से मरीजों को मिलने वाली मुफ्त दवाओं की। सरकारी अस्पताल का एक रुपया का पर्चा बहुत महंगा पड़ रहा है। तीमारदार को यह किसी नर्सिंग होम के पर्चे से कम नहीं लगता। बात चाहे सामान्य रोगी की हो अथवा गंभीर की। चिकित्सक बगैर बाहर से दवाएं मंगाए मानने वाले नहीं।
अमर उजाला की टीम ने सोमवार को सदर अस्पताल में जो देखा उससे सरकारी इलाज का सच छन कर बाहर आ गया। सफेद पर्ची के साथ हाथ में पीली पर्ची पकड़े तीमारदार पहले दवा वितरण कक्ष फिर उसके बाद मेडिकल स्टोर की राह नाप रहे थे। गौर करने वाली बात यह है कि जो दवाएं अस्पताल में है उनसे अस्सी फीसदी रोगी का इलाज किया जा सकता है। शासन से लेकर स्थानीय स्तर पर प्रशासन तक बाहर से दवाएं न लिखी जाए। इसे लेकर शिकंजा कसता है। बावजूद सदर अस्पताल में इस प्रथा पर विराम लगने के बजाए और तेजी देखने को मिल रही है। अस्पताली सूत्र बताते है कई चिकित्सक इस सोच के साथ चैंबर पकड़ते हैं कि उनके पास हर तरह के रोगी आएं। ताकि वह पीली पर्ची लिखकर कमीशन को और बढ़ा सके।

सीन एक-
खखरेड़ू सीएचसी के तेंदुआ पबहा की नत्थी देवी ओपीडी से निकली तो हाथ में रजिस्ट्रेशन का पर्चा तो था ही। साथ में थी दो पर्चियां- एक सफेद और एक पीली। पीली पर्ची में चिकित्सक ने 140 रुपए में मिलने वाला प्रोटोमैक्स नाम का विटामिन का सीरप लिखा था। जबकि 273 रुपए की इक्यूझिम नाम की एंटीबायटिक कैप्सूल बाहर से खरीद कर लाने को लिखा गया था। बाहरी पर्चे में मिली पंाच दिन की दवाओं की कीमत 413 रुपए चुकानी पड़ गई।

सीन दो-
गोपालगंज पीएचसी के महोई गांव के मुस्ताक महीने भर से सदर अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं। चिकित्सक ने दो पर्ची लिखी । जिनमें सफेद में दो दवाएं लिखी थी जबकि बाहर से मंगाई जाने वाली पर्ची में इनकी संख्या तीन थी। पूछने पर बोले दो सीरप व एक कैप्सूल बाहर से लिखा है। एक सीरप की कीमत 100 रुपया व दूसरे की 85 रुपया है। जबकि एक कैप्सूल की कीमत दस रुपए। इस प्रकार से पांच दिन की दवाएं 235 रुपए की पड़ रही हैं।

सीन तीन-
हुसैनगंज सीएचसी के हाजीपुरगंज निवासी सुमित कुमार भी पीली पर्ची के साथ ओपीडी चढ़ रहे थे। टोकने पर कहा सरकारी इलाज की सोच कर आया था कि पैसा नहीं लगेगा। लेकिन यहां तो जितनी दवाएं अस्पताल की नहीं लिखी गई उससे ज्यादा दवाएं तो बाहर की खरीदनी पड़ी। जिनकी कीमत तीन सौ बीस रुपया अदा करनी पड़ी। फिर कहा इससे तो अच्छा था किसी नर्सिंग होम चले जाते। कम से कम चिकित्सक ठीक से जांच तो करता।

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