36 वर्ष से मिल रहीं हैं सिर्फ तारीखें

Farrukhabad Updated Thu, 06 Sep 2012 12:00 PM IST
फर्रुखाबाद। चकबंदी विभाग की चकरघिन्नी में फंसे तमाम ग्रामीणों की हालत आगे कुंआ तो पीछे र्खाइं की है। चकबंदी के मुकदमे इतने पुराने हो गए हैं कि अब लोगों की प्रतिष्ठा से जुड़ गए हैं। ऐसे में न तो वे मुकदमा वापस ले पा रहे हैं और न ही आगे लड़ने की हिम्मत गवाही दे रही है। कई तो ऐसे हैं, जिनके पिता ने मुकदमा दर्ज कराया और ताउम्र पैरवी भी की, फिर भी फैसला नहीं आया और अब बेटे को मुकदमे की पैरवी करनी पड़ रही है। मोहम्मदाबाद के मोहल्ला शास्त्री नगर निवासी राधेश्याम बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी न्यायालय में तारीख पहुंचे थे। राधेश्याम ने बताया कि वर्ष 1976 में चकबंदी विभाग में उनके पिता सूरजप्रसाद ने डेढ़ बीघा जमीन का मुकदमा दर्ज कराया था। चकबंदी कर्मचारियों ने उसकी डेढ़ बीघा जमीन रामाधार के नाम राजस्व अभिलेखों में अंकित कर दी थी। समय के अंतराल में पिता सूरज प्रसाद की मृत्यु हो गई। राधेश्याम ने बताया कि मुकदमे के विपक्षी रामाधार की भी मौत हो गई और उनके वारिस सर्वेश कुमार मुकदमा लड़ रहे हैं। राधेश्याम ने बताया कि 36 साल से तारीख दर तारीख मिल रही है। रोहिला निवासी हरीश कुमार यादव, मोहम्मदाबाद कस्बा निवासी चंद्रकिशोर, रामबाबू जोशी, श्रीकृष्ण दुबे, नगला किसान अब अबंतीबाई नगर निवासी रामस्वरूप वर्मा भी चकबंदी कार्यालय में मुकदमें के सिलसिले में ही पहुंचे थे। इन लोगों ने बताया कि मोहम्मदाबाद पहले ग्रामसभा थी। सन् 1976 से मोहम्मदाबाद की चकबंदी चल रही है। 36 साल के बाद अभी तक चकबंदी की अंतिम प्रक्रिया धारा 52 का अभी तक प्रकाशन नहीं हो सका है। ग्रामीणों का कहना है कि मुकदमेबाजी में उन लोगों का बेवजह समय और धन बर्बाद होता है। कभी एसओसी के न्यायालय से मुकदमा निर्णीत होता है तो डीडीसी के न्यायालय में रिवीजन प्रस्तुत करने पर वहां से रिमांड कर दिया जाता है।

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