प्रार्थना के लिए शब्द स्थान समय नहीं, भाव चाहिए

Farrukhabad Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
फर्रुखाबाद। बढ़पुर स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित सत्संग में महात्मा रघुवीर सहाय ने कहा कि प्रार्थना के लिए शब्द स्थान समय नहीं, भाव चाहिए। प्रार्थना के बाद मन तृप्त हो जाए तो समझो भूखे को भोजन मिल गया।
उन्होंने कहा कि संतों के साथ रहने से हमें उनके जैसे विचार आते हैं। संसार में जीने के लिए हमें नम्रता को अपनाना होगा और अहंकार, क्रोध को त्यागना होगा, तभी हम सच्चे गुरसिख कहला पाएंगे। उन्होंने कहा कि आज संसार में जो भी पूजापाठ हो रहे हैं। उससे भगवान रिझने वाले नहीं हैं। हमें भक्ति हनुमान और मीरा की तरह करनी चाहिए। भगवान को जब हम तन, मन और धन समर्पण कर देते हैं। फिर हमें किसी भी प्रकार की चिंता करने की जरूरत नहीं रहती है। वह हमारे सभी कार्य संपूर्ण करता रहता है। भक्तों की पुकार प्रभू तक तभी पहुंचती है, जब प्रार्थना हृदय से निकली हो। ऐसी प्रार्थना के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। रोम-रोम में रमा हुआ राम भक्त की मूक प्रार्थना से भी उसकी सहायतार्थ प्रकट हो जाता है। भक्त के भावों को यह अंतर्यामी जान लेता है। उन्होंने कहा कि प्रार्थना के लिए शब्द स्थान और समय की अपेक्षा भावों की ही जरूरत है। बस प्रार्थना के बाद मन तृप्त हो जाए तो समझो भूखे को भोजन मिल गया। सचमुच प्रार्थना रोटी, स्थान और नींद है। बस प्रभू के द्वार पर दस्तक देने की जरूरत है। इस मौके पर रमेशचंद्र, श्याम मनोहर, गौरव आदि मौजूद रहे।

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