कटरी के गांवों से बद्तर है कंपिल

Farrukhabad Updated Mon, 28 May 2012 12:00 PM IST
कंपिल। नाम बड़े और दर्शन छोटे। पांचवे निकाय चुनाव की दहलीज पर खड़ी सतयुग के संत कपिल मुनि की तपस्थली व द्वापर के महाराज द्रुपद की राजधानी से गौरवान्वित लेकिन मतदाताओं के लिहाज से प्रदेश की सबसे छोटी नगर पंचायत कंपिल पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। नगर पंचायत में व्याप्त भ्रष्टाचार, ठेकों की राजनीति और मठाधीशों के खेल ने इस धर्मनगरी को कटरी के ग्रामों से भी बद्तर बना दिया है। हर चुनाव में वादे तो बड़े-बड़े हुए लेकिन न तो सड़कों की दशा सुधरी और न ही लोगों को दो घूंट स्वच्छ पानी नसीब हुआ। आसन्न चुनाव में मतदाताओं के रूख से साफ लग रहा है कि इस बार चुनाव का फैसला जातीय समीकरणों पर न होकर बिजली, पानी, राशन और कंपिल को पर्यटन मानचित्र पर लाने की पहल के मुद्दे पर होगा।
कंपिल फर्रुखाबाद जनपद की धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण नगर पंचायत है। यहां सतयुग के संत भगवान कपिल का आश्रम, त्रेता के भगवान राम के अनुज शत्रुघ्न द्वारा स्थापित रामेश्वरनाथ शिव मंदिर, महाभारत कालीन द्रोपदी कुंड और कलयुग में देवनायकाचार्य द्वारा स्थापित 11 खंडीय गीता ज्ञान आश्रम है। इसके अलावा जैन धर्मों के दोनों संप्रदायों के भव्य मंदिर हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार नगर की मौजूदा आबादी 10283 और कुल 7400 मतदाता हैं। नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद वर्ष 1988-89 में यहां पहला चुनाव लड़ा गया। तब कुल 4500 मतदाता थे। मजेदार बात यह भी है कि जिन धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित व सुंदरीकरण की आवश्यकता के मद्देनजर कंपिल को नगर पंचायत का दर्जा दिया गया। माननीयों ने चुनने के बाद उन्हीं स्थलों को विकास के दायरे से बाहर कर दिया। उल्टा वोटों की खातिर धार्मिक व सार्वजनिक स्थलों पर कब्जे का खेल शुरू हो गया। पिछले चार चुनावों में इस नगर पंचायत क्षेत्र में जातिवाद व संप्रदाय का बोलबाला रहा है। मुख्यतः धार्मिक संप्रदाय के आधार पर ही डा. उपेंद्रदत्त शर्मा, डा. सीताराम बाथम, विमला बाथम और पुष्पा शुक्ला चुनाव जीतीं। पिछले चुनाव के दौरान आम जनता से जुड़े कई मुद्दे टूटी सड़कें, दूषित पेयजल, बदहाल परिवहन व्यवस्था, शिक्षा व चिकित्सा का घोर अभाव, राशन, बिजली की आंख मिचौनी पर खूब आंसू बहाए गए। बड़े-बड़े वादे किए गए। लेकिन ऐन मतदान वाले दिन सब ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। नतीजतन न तो नगर का विकास हुआ न ही आम जनता से जुड़े मुद्दे पर ध्यान दिया गया। कमीशनबाजी को लेकर सदन में मारपीट की घटनाएं चर्चा में रहीं। निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद दावेदारों के बीच जंग शुरू हो गई है। बड़े-बड़े वादे शुरू हो गए हैं। लेकिन नगर का मतदाता इस बार जातिवाद व संप्रदाय को तवज्जो देने के मूड़ में नहीं है। लोगों का कहना है कि इस बार ऐसे लोगों को चुनना है, जिन्हें सदन में नगर के विकास की स्वस्थ चर्चा करने की समझ हो। दूषित पेयजल, बिजली, परिवहन, अस्पताल में डाक्टरों की तैनाती, टूटी सड़कें व भ्रष्टाचार इस बार बड़े मुद्दे हैं। चुनावी चर्चा के आधार पर इस बार चुनाव में जातीय समीकरणों का गणित नहीं चल पाएगा।

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