मंदी से जरदोजी धंधे की चमक फीकी

Farrukhabad Updated Wed, 07 May 2014 05:31 AM IST
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फर्रुखाबाद। घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मंदी से जरदोजी कारोबार की चमक उजाड़ होने लगी है। बाजार के बिगड़े रुख से कारखानाें के अड्डे सन्नाटे में हैं। कारीगराें को रोजगार की चिंता सताने लगी है।
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जिले में जरदोजी का सालाना कारोबार 60 करोड़ रु पये का है। इसमें से 35 से 40 फीसदी कारोबार सिर्फ लंहगों से होता है। 15 फीसदी कारोबार की हिस्सेदारी विदेशों में निर्यात से है। यहां तैयार लंहगे, साड़ी, चुनरी, शूट, साड़ी भारत भर में पहुंचते हैं। घरेलू बाजार में दिल्ली, पंजाब,हरियाणा, जयपुर, हैदराबाद, लखनऊ, मुंबई, कोलकाता,चेन्नई में इनके खासे कद्रदान हैं। सीरिया, लेबनान, दुबई,आस्ट्रेलिया,अमेरिका, मलेशिया, अफ्रीका, श्रीलंका व लंदन में यह आइटम इन्हीं शहरों के कारोबारियों के जरिए पहुंचते हैं। इस कारोबार से 60 हजार घराें के चूल्हे जल रहे हैं। पिछले साल शनील के पैच वर्क और नेट के कलीदार लहंगे, चुनरी, शूट व साड़ी की खूब डिमांड रही। सीजन में इस धंधे में पैसा लगाने वालाें ने मोटा मुनाफा कमाया था। फायदा देख दूसरे धंधाें से जुड़े कारोबारियाें ने भी निवेश कर दिया । इन्हाेंने तैयार आइटमाें का स्टाक कर लिया था। इन्हें सीजन में बड़ी डिमांड की उम्मीद थी। मंदी ने इनके अरमानाें पर पानी फेर दिया है। इससे इनका पैसा भी फंस गया है। इन दिनों शहर की बड़ी मंडियाें नखास व साहबगंज में सन्नाटा है। छोटे कारोबारी लागत निकालने के लिए औने पौने दामाें में माल बेचने पर आमादा हैं। डायराें (कपडे़ की रंगाई करने वाले रंगरेज) की रोजी पर भी संकट खड़ा हुआ है। इनके ठिकानाें पर धधकने वाली भट्ठियां खामोश हैं। रंगरेज वीपी सिंह झल्लू कहते हैं कि मंदी से परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।
क च्चे माल की डिमांड भी गिरी
जरदोजी कारोबार में सालाना 15 करोड़ रुपये के कच्चे माल की खपत होती है। शहर में कच्चे माल की 200 दुकानें हैं। इन पर बैठे दुकानदार आजकल खाली हाथ हैं। दुकानदार इमाम शाहमीर का कहना है कि बिक्री 50 फीसदी से भी कम रह गई है।

नया काम ढूंढ रहे डिजायनर
डिजायनर भी परेशानी में हैं। यह डिजायन को बटर पेपर पर उके रते हैं। इसके बाद इसे कपड़े पर कॉपी किया जाता है। डिजायनर देवेंद्र, राहील का कहना है कि अब इस धंधे में कुछ बचा नहीं है।


सरकार की बेरुखी को मानते जिम्मेदार
जरदोजी कारोबारी उद्योग की इस हालत के पीछे सरकार की बेरुखी को जिम्मेदार मान रहे हैं। इनका कहना है कि कच्चे माल पर सब्सिडी, बिजली व आसान लोन की सुविधाआें से हालातों में सुधार हो सकता है। पुराने कारोबारी रक ाबगंज के शुजातउल्लाह का कहना है कि करोबार को बढ़ावा देने के लिए बेहतर सड़कें, यातयात व बिजली की जरूरत है। यह नसीब नहीं हैं। खैराती खां के शारिक अली, चीनीग्रान के मोहम्मद सिद्दीकी मंसूरी, छावनी के रफ ी अहमद अंसारी का कहना है कि सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो इससे भी बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं।
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