यहां चार फेरों में बंध जाती जिंदगी की डोर

Farrukhabad Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
फर्रुखाबाद। हिंदू रिवाज में एक तरफ जहां सात फेरों को जीवन भर का साथ माना जाता है वहीं साध समाज के दूल्हे व दुल्हनों की जिंदगी की डोर चार फेरों में बंध जाती है। दूल्हा-दुल्हन अग्निकुंड के बजाय गद्दी के फे रे लेते हैं। फेरों के दौरान ब्रह्म चौरी पढ़े जाते हैं। अमावस से साध समाज में विवाह आयोजनों का दौर तेज हो गया है। यह पूर्णमासी तक चलेगा। पूर्णमासी के बाद अमावस तक लग्न नहीं होगी। इस समाज के अलावा सिखों में भी चार फेरों की परंपरा है। साध समाज की देशभर में आबादी करीब 15 हजार है, जिसमें 1500 फर्रुखाबाद में रहते हैं।
साध समाज में विवाह क ो कुंडली मिलाने व मुहुर्त की परंपरा नहीं है। दूल्हा व दुल्हन परिवारों की रजामंदी से लग्न तय होते हैं। सगाई के बाद दुल्हन के परिजन मोहरायतों (शादी कराने वाले) से विवाह ब्यौरा लिखाते हैं। इसमें विवाह की तारीख दर्ज की जाती है। टहलुआ इसे दूल्हा पक्ष के पास पहुंचाते हैं। इस ओर की सहमति के बाद फेरों की तारीख तय होती है। दूल्हा व दुल्हनों क ो गुरु सिखी दी जाती है। उबटन, भात पहराने, पगिया, सेहरा व घुडचढ़ी की रस्म भी है। विवाह के समय दो चौकी रखी जाती हैं। यह दुल्हन के मामा लाते हैं। वर बाएं हाथ की गद्दी पर व वधू दाएं ओर की गद्दी पर बैठती है। मोहरायत ब्रह्म चौरी मंत्र पढ़ते हैं। ब्रह्मचौरी में आत्मा का शब्द से मिलन की जुगत बताई जाती है। इन्हीं मंत्रों पर यह फेेरे लेते है। चौथे आखिरी फेरे पर इनके बैठने का स्थान बदल जाता है। मोहरायत जय प्रकाश साध बताते हैं कि शुदी में ही लग्न होते हैं। वदी में विवाह नहीं हो सकते। सावन, भादौं व पूस में भी विवाह बंद रहते हैं।
उधर, ज्ञानी गुरुवचन बताते हैं कि सिखाें में भी चार फेरे होते हैं। इन्हें लांवा कहा जाता है। दूल्हा व दुल्हन गुरुग्रंथ साहिब के फेरे लेते हैं। भंते नागरत्न ने बताया कि बौद्धिस्ट रिवाजों में फेरे नहीं होते हैं। दूल्हा दुल्हन पांच संकल्प भर लेते हैं। कन्हैयालाल जैन के मुताबिक जैन अनुयायियाें में सात फेरों से शादी होती है। साध सतनामी विजय फूल साध का कहना है कि हर प्रांत में विवाह का रिवाज एक सा है।

विवाह के मंगल गीत
विवाह ब्यौरा लिखे जाने से पहले दुल्हन के घर मंगल गीत ‘मंगल शुभ घड़ी शुभ दिन महूरत, सुघड़ पंडित लाये हो...’ गाया जाता है। सेहरा के समय ‘सेहरा-तखत बैठ आलम गुर गाजै, कालिंग रा दल भौसै भाजै...’ गाने की परंपरा है। दुल्हन के श्रंगार के दौरान ‘चुनरी, तुम पहिरौ सुमत श्रंगार...’ भजन की चुनरिया गाई जाती है। ब्रह्मचौरी में ‘निरत के थोक सै सुरत सातै भई, सुरत के थोक सै सेस कंपा...’ पढ़ते हैं। विवाह के बाद साध संगत, श्री सतयुग मध्यते, विवाह हतंग, निर्भय नंग.. पढ़ा जाता है।

साधों का इतिहास
इतिहासकार विलियम इरबिन के अनुसार साध सन् 1714 में फर्रुखाबाद शहर में बसे थे। समाज केे लोगाें ने कपड़ों की छपाई का काम शुरू किया। पहले आलू केे ब्लाक से छपाई की जाती थी। बाद में लकडी़ के ब्लाक और अब प्रिंटिंग मशीनों से काम होने लगा है। विजय फूल साध बताते हैं जिले में इस समय इनकी आबादी 1500 के करीब है। यूपी व दिल्ली में सबसे ज्यादा 10 हजार की आबादी है। देश भर में इनकी तादाद 15 हजार है। यह राजस्थान, हरियाणा, मुंबई, कोलकाता, तमिलनाडु व गुजरात में बसे हैं।

खास बात
देश में साध समाज की आबादी 15 हजार के करीब
फर्रुखाबाद में 1714 से रिहाइश है।
उत्तर प्रदेश व दिल्ली में 10 हजार साध परिवार रहते हैं।
जिले में साध समाज की आबादी 1500 ।
सावन, भादौं व पूस में भी विवाह बंद रहते हैं।
मास शुदी में ही होते हैं लग्न।
राजस्थान, हरियाणा, मुंबई, कोलकाता, तमिलनाडु व गुजरात में भी निवास।

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