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अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग से मिट्टी बीमार

Farrukhabad Updated Sun, 14 Oct 2012 12:00 PM IST
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फर्रुखाबाद। लगातार रसायनों के प्रयोग से जिले के तीन ब्लाकों की मिट्टी बीमार हो गई है। मिट्टी में जीवाश्म कार्बन सहित अन्य पोषक तत्वों की भारी कमी हो गई है। फलस्वरूप फसल की पैदावार घट गई है। कृषि वैज्ञानिक रसायनिक खादों का कम से कम और जैविक खाद का अधिक प्रयोग करने की सलाह दे रहे हैं। खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी से दिन प्रति दिन उसकी उर्वरा शक्ति क्षीण हो रही है। मिट्टी में जीवाश्म कार्बन की अपेक्षित मात्रा 8 प्रतिशत है जबकि नवाबगंज, मोहम्मदाबाद और शमसाबाद ब्लाक में यह 0.2 से 0.3 प्रतिशत रह गई है। मिट्टी के कमजोर होने से इन ब्लाकों में पैदावार तेजी से गिर रही है।
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पौधों के विकास व वृद्धि के लिए 16 तत्वों जैसे आक्सीजन, हाइड्रोजन, कार्बन, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, लोहा, तांबा, मैगनीज, मोलीबिडनम, गंधक, क्लोरीन, जिंक की जरूरत होती है। इन तत्वों कमी का सीधा असर पौधे की सेहत पर पड़ता है और फिर पैदावार प्रभावित होती है।

मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट
ब्लाक नमूनों की संख्या नत्रजन फास्फेट पोटाश
बढ़पुर 2594 1.89 (लो) 1.98 (लो) 3.12 (मीडियम)
राजेपुर 2806 1.93 (लो) 1.79 (लो) 3.17 (मीडियम)
कमालगंज 6453 1.85 1.80 3.09 (मीडियम)
कायमगंज 877 1.99 1.91 3.23 (मीडियम)
शमसाबाद 905 1.71(वैरी लो) 1.85(लो) 3.00 (मीडियम)
नवाबगंज 1110 1.73(वैरी लो) 1.89 (लो) 2.94 (मीडियम)
मोहम्मदाबाद 5106 1.74(वैरी लो) 1.76 (लो) 3.05 (मीडियम)

जीवाश्म पदार्थ क्या हैं-
गोबर, मलमूत्र, पौधों की पत्तियां, डंठल, जड़, धान का पुआल, हरी घास आदि हैं।

जैविक खाद क्या है-
नेडेफ कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट, हरी खाद व एफवाईएम को जैविक खाद कहा जाता है।
-नेडेफ कंपोस्ट
जमीन के लेवल से ऊपर एक गड्ढा पक्की चहारदीवारी का बनाकर उसमें जगह-जगह छेद कर दिए जाते हैं ताकि आक्सीजन मिलती रहे। इसमें गोबर, मलमूत्र, पौधों की पत्तियां, डंठल, जड़, धान का पुआल, घास आदि पदार्थों को इस गड्ढे में डाल दिया जाता है। इससे नेडेफ कंपोस्ट तैयार हो जाती है। ऐसा करने से दोहरा लाभ होता है। पहला प्रदूषण और गंदगी का सफाया होता है और दूसरा जैविक खाद का खेतों में प्रयोग करने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
-वर्मी कंपोस्ट
इसमें एक स्थान पर केंचुए छोड़ दिए जाते हैं। केंचुआ को सुरक्षित रखने के लिए टीनशेड डालकर छाया कर दी जाती है जिससे वर्षा और धूप का बचाव हो सके। केंचुआ को खाने के लिए उसमें नेडेफ कंपोस्ट डाल दी जाती है और फिर केंचुआ के मल से वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाती है।
-हरी खाद
ढेंचा और सनेही की खेतों में बुआई कर दी जाती है और इसका पौधा तैयार होने पर हैरो से खेत की पलटाई कर दी जाती है इस तरह मिट्टी में मिल कर हरी खाद तैयार होती है।
एफवाईएम (फार्म यार्ड मैनुअल)
गोबर की खाद को गड्ढे में डाल कर सड़ा देते हैं। गोबर की सड़ी खाद को ही एफवाईएम कहते हैं।
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रासायनिक खाद क्या है
यूरिया, डीएपी, म्यूरेट आफ पोटाश (एमओपी), एनपीके, कैल्शियम, अमोनियम नाइट्रेट आदि रासायनिक खादें हैं।

जैविक खाद के उत्पाद से लाभ
गेहूं, चना, जौ, मटर आदि फसलों को जैविक खाद डालकर तैयार करने पर उत्पादन अच्छा होता है। खाने में स्वादिष्ट होती है। पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक भी होते हैं। इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं।
रासायनिक खादों से कैसे पीछा छुड़ाएं
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि जिन ब्लाकों में स्थिति गंभीर है, वहां धीरे-धीरे करके रासायनिक खाद का प्रयोग बंद किया जाए। पहले वर्ष 25 प्रतिशत, दूसरे वर्ष 50 प्रतिशत, तीसरे वर्ष 75 प्रतिशत कम रासायनिक खाद का प्रयोग करें और चौथे वर्ष बिल्कुल ही रासायनिक खाद न डालें। इस तरह रासायनिक खादों से पीछा छुड़ा सकते हैं और मिट्टी में जैविक खाद डालकर उसे दोबारा उर्वरा और पोषक तत्वों से भरपूर बना सकते हैं।

फसल बोने से पहले मृदा परीक्षण कराएं- उप निदेशक
फर्रुखाबाद। उप निदेशक कृषि प्रसार डा. एके सिंह ने बताया कि किसान फसल बोने से पहले अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करा लें। कृषि वैज्ञानिकों की संस्तुतियों के आधार पर संतुलित उवर्रकों का प्रयोग करें। इससे मिट्टी बीमार नहीं होगी और फसल की पैदावार भरपूर होगी।

जैविक खाद का अधिक प्रयोग करें-डा.रामकेश
फर्रुखाबाद। अध्यक्ष मृदा परीक्षण डा. रामकेश ने बताया कि किसान रासायनिक खादों का कम प्रयोग करें। जैविक खादों का प्रयोग करने से मिट्टी की भौतिक, रासायनिक, जैविक संरचना में सुधार होता है। जैविक खाद का प्रयोग होने से मिट्टी भुरभुरी होने से उसमें वायु और प्रकाश का आवागमन ठीक बना रहता है। इससे पौधे अच्छी वृद्धि करते हैं और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद प्राप्त होता है।
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