काल की कसौटीः साकेत से जुड़ती है सोमनाथ के संयोग की कहानी, नेहरू का इनकार पर मोदी बने मुख्य किरदार

अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ Updated Wed, 05 Aug 2020 05:01 AM IST
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अयोध्या - फोटो : amar ujala

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आजाद भारत में यूं तो कई मंदिरों के पुनरुद्धार, जीर्णोद्धार, नवनिर्माण और पुनर्निर्माण की कहानियां कही व सुनी जाती हैं। पर, सोमनाथ में शिवलिंग की पुनर्स्थापना और अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण देश के लोकतांत्रिक इतिहास में चारों स्तंभों की काल की कसौटी बनते हुए आगे बढ़े हैं। 
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दोनों की ध्वंस व सृजन की कहानी काफी मिलती-जुलती है और पात्रों का भी गुजरात व उत्तर प्रदेश से कोई न कोई रिश्ता रहा है। सोमनाथ से साकेत की धरती तक ऐसे संयोगों का दिलचस्प योग देखने को मिलता है। सोमनाथ ने 1026 ई. में मो. गजनी के बर्बर विध्वंस को झेला तो 1528 ई. में बाबर के सिपहसालार मीर बांकी की बर्बरता का निशाना अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि स्थान पर मंदिर बना।
ऐसे शुरू हुआ सोमनाथ का काम
उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ की बड़ी सार्वजनिक सभा में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण व शिवलिंग की पुनर्स्थापना के संकल्प की घोषणा की। जूनागढ़ के नवाब ने विरोध किया और पाकिस्तान को जूनागढ़ में मिलाने का साजिश रच डाली। तब पटेल ने सेनाओं को जूनागढ़ भेज नवाब की स्टेट का देश में विलय करा दिया और शिवलिंग की पुनर्स्थापना के काम को साकार करने की योजना पर काम शुरू कर दिया।

कैबिनेट से प्रस्ताव पर गांधी ने कराया बदलाव  
पटेल ने महात्मा गांधी से आशीर्वाद लेने के बाद नेहरू से मिलकर कैबिनेट में प्रस्ताव लाने का आग्रह किया। 1951 के प्रारंभ में कैबिनेट की बैठक हुई। सरकारी खर्च पर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ। कैबिनेट मीटिंग के बाद कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और एनवी गाडगिल गांधी के पास गए। वहां गांधी ने सरकारी खर्च पर मंदिर के जीर्णोद्धार पर आपत्ति  जताई व जन सहयोग का सुझाव दिया। इसके बाद कैबिनेट ने पुनर्विचार कर सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार ट्रस्ट की स्थापना की। इसके संचालन की जिम्मेदारी मुंशी को सौंपी गई। मुंशी 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे ।

नेहरू आयोजन में नहीं हुए शामिल  
ट्रस्ट की स्थापना से पूर्व सौराष्ट्र के तत्कालीन राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई, 1950 को मंदिर के जीर्णोद्धार के काम की आधारशिला रख दी। इस बीच, सरदार पटेल की मृत्यु के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार में खाद्य एवं रसद मंत्री के साथ-साथ गृह मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार देख रहे केएम मुंशी ने सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की पुनर्प्रतिष्ठा व पुनर्निर्माण के काम के शुभारंभ की तिथि 11 मई, 1951 तय कराई। राममंदिर आंदोलन से जुड़े रहे अमित पुरी बताते हैं कि मुंशी ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद व प्रधानमंत्री नेहरू को आमंत्रित किया। नेहरू ने कार्यक्रम में भाग लेने से इन्कार कर दिया और राजेंद्र बाबू को भी रोका। पर राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को अनसुना करके आयोजन में भाग लिया और पूजा-अर्चना भी की। साथ ही कहा कि दुनिया देख ले कि विध्वंस से निर्माण की ताकत बड़ी होती है। 
 
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सोमनाथ जैसा राममंदिर का इतिहास

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