संदिग्ध निकली हमले की कहानी

Faizabad Updated Tue, 11 Dec 2012 05:30 AM IST
फैजाबाद। फायर कई राउंड हुआ, लेकिन उसके निशान दीवारों पर नहीं मिले। गवाही में वादी ने कहा कि वह खुद घायल को लेकर अस्पताल गया, लेकिन अस्पताल में उसकी आमद नहीं दर्ज हुई। एफआईआर खुद दर्ज कराने की बात भी जीडी में नहीं पाई गई। इन्हीं तर्कों के कारण अभियोजन कथानक संदिग्ध हो गया और जानलेवा हमले के आरोपी बसपा नेता प्रमोद सिंह व विकास सिंह को अदालत ने संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त कर दिया। फैसला विशेष न्यायाधीश ईसी एक्ट रामअचल यादव की अदालत से हुआ। मामला पूर्व ब्लाक प्रमुख रमाकांत यादव के भाई पर हुए कातिलाना हमले का है।
फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रियनाथ सिंह व सईद खान ने बताया कि घटना 28 मई 2006 की है। पुजारी पुरवा दर्शननगर निवासी पूर्व ब्लॉक प्रमुख रमाकांत यादव ने एफआईआर दर्ज कराई थी कि प्रमुखी के चुनाव के दौरान सूर्यप्रताप सिंह उर्फ भूटानी निवासी देवगढ़ द्वारा अपने साथियों के साथ बीडीसी सदस्यों पर हमला कर अगवा करने का प्रयास किया था। जिसकी रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। विकास सिंह इस मुकदमे में गवाही न देने के लिए लगातार रमाकांत को जान से मार डालने की धमकी दे रहे थे।
इसी रंजिश में घटना वाले दिन रमाकांत यादव व उनके भाई रविकांत जब अपने मकान के सामने बैठे थे तो पूराबाजार की तरफ से आए विकास सिंह व प्रमोद सिंह ने असलहे से फायर किया था। रविकांत यादव की गर्दन में गोली लगी थी। इसकी रिपोर्ट दोनों के खिलाफ जानलेवा हमला की धारा में लिखाई गई थी। बहस के दौरान वकीलों का तर्क था कि गोली घायल के दाएं कंधे पर लगकर बांए कंधे से निकल गई। यह चोट ऊंचाई से फायर करने पर आ सकती है, लेकिन एफआईआर में सड़क से मारने की बात कही गई है। रंजिश चुनाव की बताई जाती है, जबकि विकास वादी के खिलाफ कभी चुनाव नहीं लड़े।
मौके से खून, खोखा, कारतूस या दगी हुई बुलेट नहीं मिली और न ही गोली के निशान किसी दीवार पर मिले। एफआईआर वादी ने खुद दर्ज कराने की बात कही, लेकिन जीडी में आमद स्वामीनाथ की है। इन्हीं तर्कों का लाभ आरोपियों को मिला।

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