सरयू तीरे श्रद्धा का सैलाब

Faizabad Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
अयोध्या। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं ने सरयू में डुबकी लगा पुण्य प्राप्त किया। यह सिलसिला अलस्सुबह से ही चल पड़ा। पौ फटने के साथ यह और प्रगाढ़ हो उठा। सरयू की ओर जाने वाले विभिन्न मार्गों पर तिल रखने तक की जगह नहीं थी। यही नहीं रामनगरी के मठ-मंदिरों में भी दिनभर भक्तों की लंबी-लंबी कतारें भगवान पर अटूट आस्था की छाप छोड़ती रही। पावन सलिला में डुबकी लगाने के साथ गोदान की परंपरा भी जमकर निभी। श्रद्धालुओं ने गोदान कराने वाले तीर्थ पुरोहितों को दान-दक्षिणा देकर भी पुण्य अर्जित किया।
सूर्योदय के बाद पूर्वाह्न तक चले इस क्रम के साथ मठ-मंदिरों में भी श्रद्धालुओं का सैलाब दस्तक देता रहा। स्नान के बाद श्रद्धालुओं की प्राथमिकता पौराणिक महत्व की पीठ नागेश्वरनाथ की ओर रही, जहां श्रद्धावनत होने के साथ श्रद्धालुओं ने यथा शक्ति तथा भक्ति के हिसाब से भोले बाबा का अभिषेक किया। अधिसंख्य ने तो पावन नदी के जल से बाबा का जलाभिषेक किया तो ऐसे भी कम नहीं रहे, जिन्होंने दूध, घृत अथवा शहद से इस विशेष पर्व पर बाबा को नहलाया। भीड़ का आलम यह था कि यदि सुरक्षा और यातायात का चुस्त प्रबंध न होता तो दुर्घटना भी हो सकती थी। बावजूद इसके श्रद्धालु भीड़ के भारी दबाव से छिटपुट प्रभावित रहे। इस बीच भोले बाबा की एक अन्य महत्व की पीठ क्षीरेश्वरनाथ सहित अनेक शिव मंदिरों पर बाबा का पूरे उत्साह से भक्तों ने अभिषेक किया तो नगरी के आराध्य भगवान राम और उनके प्रिय दूत हनुमानजी के मंदिरों पर भी आस्था उमड़ी। बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी, वैष्णव परंपरा की आस्था के केंद्र में रहने वाला कनकभवन, रामजन्मभूमि आदि मंदिर पर सुबह से दर्शनार्थियों की लगी कतार देर रात तक कायम रही। हालांकि इसी के साथ कार्तिक मास शुरू होते ही आस्था की गुनगुनाहट शिखर का स्पर्श करने के साथ उतार पर लौटती दिखी। पूर्णिमा स्नान और आराध्य के दरबार में दस्तक देने के बाद श्रद्धालुओं का कारवां प्रत्यावर्तित भी हुआ। रामनगरी में यद्यपि पूर्णमासी की शाम भी पूरी शिद्दत से गुलजार रही पर यह साफ हो गया कि अगले एक-दो दिन में माह भर तक आस्था के ज्वार की साक्षी बनने के बाद नगरी वापस अपने ढर्रे पर होगी, जहां साधु-संत भगवान की अष्ट याम पूजा-अर्चना में तो कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। दशकों से अयोध्या की धड़कन भांपते रहे चिंतक व महर्षि अरविंद की परंपरा के साधक जयसिंह चौहान के मुताबिक यह दौर उस आध्यात्मिक ऊर्जा सहेजने का होगा, जो अगले किसी पर्व पर श्रद्धालुओं को सूक्ष्म सौगात के रूप में पुन: मिलेगी।

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