जातीय समीकरण बना तिलकराम पर दांव का आधार

Faizabad Updated Sat, 17 Nov 2012 12:00 PM IST
फैजाबाद। पूर्व एमएलसी तिलकराम वर्मा जिले के लिए जाना-पहचाना नाम है। सपा ने मिशन-2014 की फतह के लिए वर्मा पर दांव लगाया है। उन्हें फैजाबाद लोकसभा सीट से प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। पार्टी प्रत्याशी बनाये जाने के बाद तवज्जो मिलने की वजह पर पार्टी के भीतर व बाहर चर्चाओं का दौर है। पार्टी से इस बार श्री वर्मा को रेस में उतारे जाने के पीछे जातीय समीकरण को आधार माना जा रहा है। अन्यथा तो टिकट के दावेदार अन्य 18 लोगों में श्री वर्मा से कहीं ज्यादा मंजे हुए लोगों के नाम शामिल थे। तिलकराम के लिए फैजाबाद की सीट पर मुकाबला आसान नहीं होगा, क्योंकि उनके सामने वर्तमान सांसद और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री हाेंगे। हालांकि कांग्रेस ने अधिकृत रूप से अभी तक निर्मल का टिकट घोषित नहीं किया है। श्री वर्मा की यहां सांगठनिक सक्रियता भले ही बहुत ज्यादा न हो, लेकिन छह साल तक एमएलसी रहते उनके ताल्लुकात लोगों से बेहतर रहे हैं। वह परिचय के मोहताज नहीं हैं। फिर फैजाबाद संसदीय सीट को पिछड़ा बहुल माना जाता है। अहम कारण यह भी है। संसदीय क्षेत्र में वर्मा बिरादरी के करीब तीन लाख वोटर हैं। लगभग इतने ही मतदाता यादव बिरादरी के भी बताए जाते हैं। इसके अलावा एक से डेढ़ लाख के करीब पिछड़े वर्ग के दूसरे मतदाता भी हैं। अल्पसंख्यक मतदाताओं को मिलाकर किसी को भी सफलता की सीढ़ी तक पहुंचाने की ताकत को आंक कर ही सपा ने तिलकराम पर दांव लगाया। श्री वर्मा यदाकदा यहां की सपा बैठकों, बड़े नेताओं के आगमन और आंदोलनों के समय दिखते रहे हैं। संगठन में अब तक किसी जिम्मेदारी का निर्वहन न किए जाने के बावजूद सपा से श्री वर्मा पर दांव लगाए जाने के पीछे उनकी अपनी छवि, सियासत में अहम व्यवहार और रसूख है। कटरा गोसाईंगंज के मूल निवासी तिलकराम वर्मा राजनीति में भले ही पहले से सक्रिय रहे हैं, लेकिन एमएलसी वह वर्ष 1997 में चुने गए थे। इसके पहले एक बार वह जिला पंचायत सदस्य भी रहे चुके हैं। दूसरी बार सन् 2009 में विधान परिषद के लिए सपा ने उन्हें फिर प्रत्याशी बनाया, लेकिन 75 मतों से पराजित हो गये। जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ने को मैदान में उतरे तो सपा ने हीरालाल यादव के नाम पर मुहर लगा दी थी। सियासत के साथ ईंट भट्ठे के कारोबारी श्री वर्मा पर दांव लगाकर समाजवादी पार्टी ने दूसरी पार्टियों से बढ़त बनाने की कोशिश की है। वे पार्टियां जो पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी के जरिए मैदान में उतरने पर मंथन कर रही थीं, सपा ने उन्हें सोचने के लिए एक और मुद्दा दे दिया है। यदि सपा अपने टिकट वितरण पर कायम रही तो चुनाव तक सियासत के मंच पर कई बार पर्दे उठ-गिर सकते हैं।

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