1600 ई. पू. तक पहुंचती राम की ऐतिहासिकता

Faizabad Updated Fri, 09 Nov 2012 12:00 PM IST
अयोध्या। राम की ऐतिहासिकता 1600 ई. पू. तक पहुंचती है। उसके बाद से मूर्ति, सिक्के और अभिलेखों के रूप में उनका प्रचुर ब्योरा मिलता है। यह उनकी ऐतिहासिकता का पुष्ट प्रमाण है क्योंकि ऐसे लेखों और ब्योरों में उसी के होने की परंपरा रही है, जो ऐतिहासिक हो। यदि राम मिथ होते तो ऐसा नहीं हो सकता था। यह उद्गार है, अवध विश्वविद्यालय में इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभागाध्यक्ष प्रो. आलोकमणि त्रिपाठी का। वे रामकथा संग्रहालय में ‘श्री राम की ऐतिहासिकता एवं भारतीय संस्कृति में उनका योगदान’ विषयक् व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने इतिहास में परंपरा के रूप में सतत् विद्यमान राम का विवरण प्रस्तुत किया। बताया कि दूसरी शताब्दी ई. पू. के शुंग काल में रामकथा का विधिवत स्वरूप मिलता है। इसी दौर के विद्वान अश्वघोष कृत बुद्ध चरितम् में भी रामकथा का विवरण मिलता है। राम का दैवीकरण 1600 ई. पू. में प्राप्त होता है। कुषाण काल तक राम देवता के रूप में प्रस्तुत हो चले थे। वाल्मीकि रामायण की प्राचीनता चौथी-पांचवीं शताब्दी तक इंगित होती है। इससे भी प्राचीन मानी जाने वाली जैन परंपरा में राम की गणना 63 महापुरुषों की सूची में हुई है। छांदोग्यपनिषद से भी राम के बारे में प्रमाण मिलता है। अभिलेखों में गौतमी पुत्र शातकर्णि को राम, परशुराम, अंबरीष के समान शूरवीर बताया गया है। इंडोचाइना, पश्चिम, मध्य और दक्षिण पूर्व एशिया में भी राम की ऐतिहासिकता के प्रमाण बिखरे मिलते हैं। यह कहना अनर्गल है कि राम हुए ही नहीं। सरयू बाग संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामकृष्ण शास्त्री ने याद दिलाया-राम ब्रह्मैव नापर: यानी वे ब्रह्म हैं और उनकी मूल परंपरा इतिहास से परे है। वे शाश्वत हैं। व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता राजगोपाल पीठ के महंत प्रख्यात् संत कौशल किशोरशरण फलाहारी ने की। उन्होंने बताया कि राम को परमात्मा व इतिहास पुरुष, दोनों रूपों में कहने का प्रयास किया गया है। उन्होंने चिंता जताई कि आज राम जीवन दृष्टि नहीं जीविका की दृष्टि बने हुए हैं। मकसद बस इतना रह गया है कि राम के माध्यम से मठ-मंदिर बना लें,यश और धन इकट्ठा कर लें। श्री फलाहारी ने राम की ऐतिहासिकता नियत करने के प्रयास को जी बहलाने वाला ख्याल बताया। कहा कि राम की शाश्वतता स्वीकार करना कठिन यात्रा है। संचालन संग्रहालय के वीथिका सहायक मानसप्रसाद तिवारी ने किया व आभार ज्ञापन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी डॉ. लवकुश द्विवेदी ने किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में विद्वत जन व सांस्कृतिक अध्येता मौजूद रहे।

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