उत्तर पुस्तिका खरीद नीति ‘बेपर्दा’

Faizabad Updated Thu, 08 Nov 2012 12:00 PM IST
फैजाबाद। अवध विश्वविद्यालय की क्रय नीति में बीते कई वर्षों से चढ़ा महंगाई का सेंसेक्स लुढ़क गया है। लगातार दूसरे वर्ष उत्तर पुस्तिकाओं की खरीद में जहां विवि को लाखों की बचत हुई, वहीं पूर्व की क्रय नीति बेपर्दा हो गई। चालू सत्र में एकबार फिर से उत्तर पुस्तिकाओं की पारदर्शी खरीद से लाखों की चपत से विवि बच गया। इस बार ए कॉपी में विवि को प्रति कॉपी एक रुपये का तथा सी कॉपी में तकरीबन 74 पैसे का फायदा हुआ है। सूत्रों के अनुसार वर्ष भर में विश्वविद्यालय 15-20 लाख कॉपियां खरीदता है। बीते कई वर्षों में यही कॉपियां उपर्युक्त दरों से महंगी खरीदी गईं। निवर्तमान कुलपति प्रो. आरसी सारस्वत व कुलसचिव एसके शुक्ल के संयुक्त प्रयास ने विवि को आर्थिक चोट से बचा लिया। चालू सत्र में ए कॉपी 2564, बी कॉपी 1344, सी कॉपी 1425 प्रति हजार की दर से क्रय करने का टेंडर हुआ। खास बात यह है कि इस निविदा में पांच फर्मों ने प्रतिभाग किया। डाले गए टेंडर में एक फर्म को ए तथा सी कॉपी और एक अन्य फर्म को बी कॉपी आपूर्ति का आदेश निर्गत हुआ। जौनपुर की एक कंपनी का टेंडर भी निरस्त हुआ, इसकी फाइनेंशियल बिड नहीं खोली गई। प्राप्त सूचना के मुताबिक ए कॉपी का दाम पिछले वर्ष की तुलना में सीधे एक रुपये कम तो सी कॉपी का दाम 74 पैसे प्रति कॉपी कम है। बी कॉपी भी पिछले वर्ष की तुलना में सस्ती है। पिछले वर्ष जब पहली बार टेंडर प्रक्रिया काफी जद्दोजहद के बाद पूरी की गई तो ए कॉपी 2665, बी कॉपी 1449 तथा सी कॉपी 1499.77 प्रति हजार की दर से क्रय की गई थी। इसके पूर्व के वर्ष में उत्तर पुस्तिकाओं की खरीद में उपजे विवाद सेे प्रक्रिया ठप हुई। तत्कालीन कुलपति ने मुख्य परीक्षा बीच में ही रोक दी। इसी सत्र में कॉपियों की खरीद चालू सत्र की अपेक्षा महंगे दामों पर की गई। ए कॉपी की खरीद 4190, बी कॉपी 2850 तथा सी कॉपी खरीद 2950 प्रति हजार की दर से हुई। इसके पूर्व कॉपी खरीद प्रक्रिया का ढर्रा भी कमोबेश ऐसा ही रहा। उक्त दरों पर इनके पूर्व में भी कॉपियां खरीदी गईं। विवाद के चलते प्रकरण न्यायालय में गया था। जानकार कहते हैं कि प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका थी, क्योंकि पूर्व के वर्षों में जब सस्ते का जमाना था तब विवि ने उच्च दर में कॉपी खरीदी और अब जब महंगाई उफान पर है तो सस्ते दर पर कॉपियों का क्रय होना आश्चर्यजनक व सुखद है। विवि के अधिकारी कहते हैं कि प्रक्रिया पहले भी टेंडर से हुई थी और अब भी टेंडर से हो रही है। जो रेट इसमें आया उसी दर पर कॉपी खरीदी गई तो गड़बड़ी की गुंजाइश कहां है।

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