अपना पैगाम मुहब्बत है, जहां तक पहुंचे

Faizabad Updated Tue, 30 Oct 2012 12:00 PM IST
फैजाबाद। उनका जो काम है वो अहले सियासत जानें/ अपना पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे। नवाबों की इस पुरानी राजधानी ने बताया कि उसका भी पैगाम मुहब्बत है और चुनौती की घड़ी में वह अपने मिजाज से जुदा नहीं है। गत दिनों हुए उपद्रव को भूलकर शहर मौजूदा पीढ़ी के साथ अपने ढर्रे पर बढ़ता दिखा।
चार दिन के बाद सोमवार को पूर्वाह्न दस बजे से कर्फ्यू में ढील का जैसे लोगों को बेसब्री से इंतजार था। घरों से उनका निकल कर खुली हवा में सांस लेना, ठहराव के बाद पूरी तत्परता के साथ आपस में घुलना-मिलना और जरूरत की चीजों को खरीदने की प्रक्रिया से साबित हो रहा था कि उन्हें जैसे किसी दुस्वप्न से निजात मिली हो। चिकित्सक डॉ. अजय गुप्त कहते हैं, उपद्रव को पीछे छोड़कर आगे की राह लेने का अनुभव बेहद सुकून दायक है। इलाके की गंगा जमुनी विरासत के अनुरूप व्यापक फलक पर साहित्य-संगीत-संस्कृति की अलख जगाए रखने वाले कवि यतींद्र मिश्र अयोध्या और फैजाबाद की उस माटी का हवाला देते हैं, जिसमें राम की मर्यादा, बुद्ध की करुणा, जैन तीर्थंकरों की तपस्या के साथ सूफियों का आला संवाद, नवाबों की विनम्र निष्पक्षता व ऊपर वाले के लिए न्यौछावर संतों का समर्पण गुंथा है। इस परंपरा की छाया कर्फ्यू में ढील के दौरान दिखती भी है, जब किसी कुर्बान से सब्जी खरीदने के पूर्व शिक्षक विशाल तिवारी उसका कुशल-क्षेम पूछते हैं। सामान्य हो रही स्थितियां प्रशासन को भी उत्साहित करने वाली रहीं। साकेत महाविद्यालय में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. तारिक सईद उम्मीद जताते हैं कि स्थिति जल्दी ही पूरी तरह से सामान्य होगी और फैजाबाद के लोग मोहब्बत व भाईचारा की अपनी रवायत बुलंद करेंगे। यद्यपि वे यह दर्द बयां करने से नहीं चूकते कि उपद्रव से अयोध्या-फैजाबाद से जुड़ी आपसी प्रेम और भरोसे की पूंजी दागदार हो गई है। मुस्कान वापस लाने की कोशिश करते सामाजिक कार्यकर्ता गोपालकृष्ण से भेंट होती है। मीर अनीस और पं. बृजनारायण चकबस्त की याद में कोतवाली के सम्मुख ही स्थापित लाइब्रेरी को ठिठक कर निहारते हुए वे कहते हैं, ऐसे तनाव मुट्ठी भर लोगों की साजिश और आम लोगों की नासमझी से उपजते हैं। यदि हम अनीस और चकबस्त जैसों की समझ-संवेदना वाले हो सकें तो अलगाव-आक्रोश की गुंजाइश स्वत: विलीन हो जाएगी। कर्फ्यू में ढील का मौका पाते ही इस दिशा में कोशिश भी रंग लेती दिखी। राम-रहीम सेना के राष्ट्रीय संयोजक गौरव तिवारी वीरू, कैफ अब्बास, गुल मोहम्मद आदि सहयोगियों के साथ दोनों समुदाय के ठौर-ठिकानों पर दस्तक देकर गंगा-जमुनी विरासत की याद दिलाते रहे।

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