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सरयू का सीना चीरकर बचा लेते जिंदगी

Faizabad Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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फैजाबाद। श्रृंगबेरपुर में निषाद ने राम को नदी पार करायी थी तो आज अयोध्या में उसी जातीय पहचान से जुड़े लोग मौत की लहरों में छलांग लगा सरयू की उफनाई धारा में बुझती जीवन-लौ में अपने साहस का तेल डाल फिर से उसमें रोशनी भर देते है। इनको अपनी चिंता कम है लेकिन इनकी जन्म-कर्म भूमि पर आए लोगों को डूबने से बचाने की फिक्र ज्यादा रहती है। परहित सरिस धरम नहिं भाई के सच्चे आराधकों में हैं रामजी, बाबू, मुन्ना, नान्हूं, संजय, विजय, लक्ष्मन और भगवानदीन। ये अजनबियों के प्राणों के रखवाले हैं। इनको मलाल है कि उनके साहस, सेवा और जज्बे को तो वे लोग सलाम करते हैं, जो मौत की लहरों से बाहर आ जाते हैं लेकिन प्रशासन उनसे मुफ्त में ही काम लेता है तथा श्रेय खुद ले लेता है।
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बचपन में ही सरयू की लहरों से खेलने वाले इन निषादों को मां सरयू की कृपा परंपरा में हासिल है। शायद इसी का नतीजा है कि मौत से घिरे लोगों को उससे बाहर निकालने वाले इन जीवन-रक्षकों की खुद की जान कभी इतनी सांसत में नहीं पड़ी कि उनकी मौत हो गई हो। भगवान राम सरयू में जल-समाधि लेने गए तो वे हारे-हारे, रीते-रीते से थे लेकिन गुप्तार घाट पर होने वाली ज्यादातर मौतें अति आत्म विश्वास में होती हैं। सोमवार की दोपहर घाट पर रामजी और बाबू निषाद को छोड़ सभी लोग शनिवार को जल की लहरों में खो गए संदीप यादव को खोजने के लिए अपने मिशन पर निकल गए थे। बाबू निषाद ने बताया कि दो को तो बचा लिया गया लेकिन एक युवक नदी की तेज धारा में बह गया। रामजी निषाद ने मर्माहत स्वर में कहा कि 25 साल से तकरीबन दो सौ लोगों की जिंदगी हम लोगों ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगा कर बचा दी, लेकिन बदले में हमें कुछ भी नहीं मिला। उन्होंने हाई प्रोफाइल शशि हत्याकांड का जिक्र किया जब लाश को खोजने के लिए पुलिस सुल्तानपुर सीमा पर स्थित गोमती सेतु के नीचे ले गई। जीवन के इन रखवालों को इसके बदले में लाभ मिलने की बात पूछने पर रामजी आक्रोशित हो कह उठते हैं कि रुपये देने की बात छोड़िए, ले जाते हैं गाड़ी से और काम होने के बाद पैदल ही आना पड़ता है। अजनबी लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए मौत की लहरों में कूदने वाले इन निषाद- परिवारों में अंधेरा पसरा हुआ है। बेबसी है, व्यथा है। लेकिन इधर उनकी भी नजर कम ही जाती है, जिनके घरों के चिराग इन्हीं की बदौलत बुझने से बच गए।

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