जमुनापारी बकरी व भदावरी भैंस के अस्तित्व पर संकट

Etawah Updated Thu, 04 Oct 2012 12:00 PM IST
इटावा। जिले की अधिकांश जनता कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। उपजाऊ भूमि के घटते रकबे की तरह अब पशुपालन से भी लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। शहरी क्षेत्रों की ओर हो रहा ग्रामीणों का पलायन इसका मुख्य कारण है। यहां की जमुनापारी बकरी व भदावरी भैंस विलुप्त होने की कगार पर हैं। यह तब है जब अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों की जनता की आय का जरिया कृषि और पशुधन ही है।

क्या है भदावरी भैंस
भदावरी भैंस की प्रजाति अपने आप में खास है। तांबा जैसे रंग की इन भैंसों से अन्य प्रजातियों से ज्यादा चिकनाई वाला दूध मिलता है। सामान्यत: भैंस के दूध में 5 से 6 प्रतिशत फैट होता है, जबकि भदावरी भैंस के दूध में 13 प्रतिशत तक फैट होता है।

क्या है जमुनापारी बकरी
जमुनापारी बकरी की विदेशों में काफी मांग है। इस प्रजाति की बकरियों का वजन ज्यादा होने के साथ दूध ज्यादा होता है। इस समय विदेशों में इसकी कीमत भारतीय रुपए के अनुसार 15 से 20 हजार रुपए है। जमुनापारी बकरी इन दिनों विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। वर्ष 1970 में इसकी संख्या जिले में 85 हजार के आसपास थी। जो 1984 में घटकर 35 हजार के आसपास रह गई। वर्ष 2000 में इसकी संख्या घटकर 15 हजार रह गई। वर्तमान में जिले में पांच हजार के आसपास ही जमुनापारी बकरियां बची हैं।

भदावरी फार्म पर तैयार होती है नस्ल
जमुनापारी बकरी व भदावरी भैंस दोनों ही प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गईं हैं। शहर में स्थित भदावरी प्रजनन प्रक्षेत्र में दोनों ही नस्लों को तैयार किया जा रहा है। जमुनापारी बकरों को तैयार करके 30 रुपए के अंशदान पर ग्रामीणों को दिया जाता हैं। वहीं भदावरी भैंस की नस्ल को बचाने के लिए यहां से 150 रुपए के अंशदान पर भदावरी नस्ल का भैंसा पशुपालकों को दिया जाता है। सीमित संसाधन नस्ल तैयार करने के लिए नाकाफी हैं।

बंद पड़े हैं प्रजनन केंद्र
चकरनगर क्षेत्र में ग्राम चांदई में जमुनापारी बकरा प्रजनन केंद्र पांच वर्ष से बंद पड़ा है। ग्राम सहसों में भदावरी भैंस प्रजनन केंद्र की बिल्डिंग धराशाई हो गई। वर्षों से यहां पर कोई भी भदावरी भैंसा नहीं है। चकरनगर क्षेत्र में चार भदावरी भैंस प्रजनन केंद्र हैं। वर्तमान में सहसों, करियावली, सिडौंस, चांदई के प्रजनन केंद्र बंद पड़े हैं।

क्यों घट रहा है पशुधन
वर्ष 1988 से 2006 तक दस्यु समस्या और चंबल घाटी के जंगलों में विलायती बबूल की अधिकता से पशुओं का चारा लगभग समाप्त हो गया। विलायती बबूल के बड़े कांटे और जहरीले फल पशुओं की बीमारी का कारण बनने लगे। कहा तो यहां तक जाता है कि विलायती बबूल के चलते ही पशुओं में मुंहपका एवं खुरपका का रोग होने लगा। महंगाई और चारे की समस्या के अलावा ग्रामीणों का शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन पशुधन घटने का प्रमुख कारण बना। पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए जिले में पशुधन विभाग के माध्यम से कई योजनाएं संचालित हैं लेकिन जानकारी के अभाव में इन योजनाओं का लाभ पशुपालकों को नहीं मिल पाता है।

जिले में पशुधन पर नजर (2007 की गणना के अनुसार)
भैंस 222927
गाय 116145
बकरी 260453

प्रमुख बीमारी व उपचार
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बीमारी बचाव
गलाघोंटू टीकाकरण
खुरपका टीकाकरण
मुंहपका टीकाकरण
लंगड़िया बुखार टीकाकरण
सर्रा टीकाकरण नहीं है सिर्फ उपचार है।

आज ही चार्ज लिया है, पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए पशुपालकों को जागरूक किया जाएगा। उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाएगी।-डा. एसपी राम, जिला पशु चिकित्साधिकारी।

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