सशस्त्र लालसेना हुई थी तैयार

Etawah Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
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12 अगस्त 1942 को औरैया के विद्यार्थियों और देहात की जनता ने तहसील भवन पर झंडा फहराने का प्रयास किया। उसी समय पुलिस पहुंच गई और गोली चलाने लगी। इस कांड में छह क्रांतिकारी मौके पर ही शहीद हो गए और कई घायल हुए। जिले में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया के नेतृत्व में 1857 की क्रांति के आधार पर सशस्त्र लालसेना तैयार की गई। सेना में ग्रामीण युवकों को भर्ती कर प्रशिक्षण दिया जाने लगा।
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राजा रूप सिंह के नाती भी कूदे आंदोलन में
भरेह का किला अंग्रेजों द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद उनके वंशज अयाना में रहने लगे। 1942 के आंदोलन में राजा रूप सिंह के नाती निरंजन सिंह भी कूद गए। कई बार वह जेल गए और अंग्रेजों से लोहा लिया। देश आजाद होने के बाद जनवरी 1974 को सेनानी निरंजन सिंह के साथ जिले के 548 स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र देकर भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया था।
जिले के हर कोने से लड़ी गई लड़ाई
भरेह के राजा रूप सिंह के वंशज हेमरूद्र सिंह का कहना है कि स्वतंत्रता के लिए लड़ाई जिले के हर कोने से लड़ी गई। 1858 में अप्रैल, मई व जुलाई में अजीतमल में राजा रूप सिंह और ब्रिटिश फौज से युद्ध हुआ। रूप सिंह की सेना के सिपाहियों ने बड़ी वीरता से युद्ध किया। रूप सिंह राजा की सेना को दबाने के लिए अंग्रेजों की झांसी और ग्वालियर से सेना यहां आई। गोहानी में राजा निरंजन सिंह को अंग्रेजी सेना ने घेरा लेकिन वह पकड़ में नहीं आए। बीजलपुर घाट का युद्ध जिले की प्रमुख घटनाओं में से एक हैं। यहां नावों से कालपी जाते समय क्रांतिकारी अंग्रेेजी सेना से भिड़े थे।
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