आजादी के रक्षक ः जीवों को बचाने में जुटे राजीव

Etawah Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
इटावा। वन्य जीव संरक्षण की दिशा में पिछले करीब डेढ़ दशक से कार्य करते आ रहे पर्यावरणविद डॉ. राजीव चौहान को अपने इस मिशन में काफी सफलता मिली है। वह मानते हैं कि उनका लक्ष्य कठिन जरूर है पर उसको पूरा जरूर कर लेंगे। प्रशासनिक व्यवस्था से सफलता पाना संभव नहीं है इसीलिए उन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए जन जागरूकता का रास्ता अख्तियार किया। परिणाम यह हुआ कि आज कहीं भी किसी प्रकार का वन्य जीव अथवा दुर्लभ प्रजाति कहीं किसी को नजर आती है तो उसकी सूचना सबसे पहले राजीव चौहान के पास पहुंचती है।
उन्होंने वन्य जीव संरक्षण की दिशा में वर्ष 1996 से शुरूआत की। 1998-99 में जब चंबल नदी में कछुुओं का खूब शिकार होता था, उस समय ऐसा लगा कि ऐसे तो यह प्रजाति खत्म हो जाएगी। 1999 में सोसाइटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर का गठन किया। शिकार रोकने में अधिकारियों की मदद की। हालांकि इस कारोबार से जुड़े लोगों के लिए उनका संगठन किरकिरी बना, पर वह विचलित नहीं हुए। वह कहते हैं कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं लेकिन उनका सख्ती से पालन नहीं हो पाता है। ऐसे में उनकी जागरूकता मुहिम रंग लाने लगी। लोगों में बेजुवान प्राणियों के लिए रहम का भाव जगने लगा। लोग सूचनाएं देने लगे। उनका विशेष ध्यान कछुआ, घड़ियाल, सारस, डालफिन, प्रवासी पक्षियाें के सरंक्षण पर है।

बहेलिया द्वारा लाए गए पक्षियों को देख आया विचार
डॉ. राजीव चौहान बताते हैं कि 1996 की बात है। एक बार एक बहेलिया 60-70 प्रवासी पक्षियों को लेकर उनके पास आया। लोग मांस खाने के लिए उन पक्षियों को खरीदते थे। उस समय उन्हें पक्षियों को आजाद करने क ा विचार मन में आया और पिताजी के माध्यम से उनको खरीदकर छुड़वा दिया। उसी दिन से इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए।

अमेरिका में दिखा लोगों में दया का भाव
वर्ष 2006 में वेटलैंड इंस्टीट्यूट यूएसए से कछुआ संरक्षण अभियान के तहत बुलावा आया। वह वहां छह माह का प्रशिक्षण लेने पहुंचे। वहां देखा कि लोगों में वन्य जीवों के प्रति दया का भाव है। प्रजनन काल में वहां कछुए अंडे रखने के लिए रोड साइड पर आ जाते है। कछुए रोड पार करते रहते हैं। इसे देखते हुए लोग वाहन धीमी गति से निकालते हैं। यही नहीं यदि कोई कछुआ रोड पार करता दिखा तो गाड़ी रोककर उसे उठाकर किनारे करते हैं।

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