इटावा रेलवे अस्पताल में 56 सालों में एक भी मरीज भर्ती नहीं हुआ

Etawah Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
केस हिस्ट्री-1
हाल ही में एक्सप्रेस ट्रेन में अपने बहनोई के साथ यात्रा कर रहे एक युवक के टूंडला स्टेशन के बाद पेट में दर्द की शिकायत हुई। युवक के बहनोई ने रेलवे के आला अधिकारियों को अपने साले की बीमारी के बारे में बताया, लेकिन रास्ते में इलाज न मिलने के कारण उसने दम तोड़ दिया। इटावा स्टेशन पर उसका शव उतारकर पोस्टमार्टम कराया गया।

केस हिस्ट्री-2
बीते रविवार को एक वृद्धा अपने नाती के साथ भरथना रेलवे स्टेशन पर मालगाड़ी की चपेट में आने से घायल हो गई। घायल महिला व उसके नाती के इलाज की जगह रेलवे अधिकारियों ने हाथ खड़े कर दिए। कस्बे के कुछ सामाजिक लोगों ने दोनों का प्राथमिक उपचार एक निजी क्लीनिक पर करवाया और बाद में उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

केस हिस्ट्री-3
एक सप्ताह पहले दिल्ली से बिहार एक्सप्रेस ट्रेन द्वारा जा रही अकेली महिला की इटावा स्टेशन से पहले अचानक तबियत बिगड़ गई। सूचना पर रेलवे अधिकारी इटावा स्टेशन पर उसे उपचार नहीं दिला सके। महिला की गंभीर हालत होने पर जीआरपी ने उसे जिला अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया।
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इटावा। ये तीनों केस इटावा रेलवे स्टेशन के आसपास बीते एक माह के अंदर सामने आए। इन तीनों केसों पर गौर किया गया तो समस्या सामने आई अन्यथा रोजाना न जाने कितने रेल यात्री रेलगाड़ी व स्टेशन परिसर पर इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। यह स्थिति तब है, जबकि रेलवे देश का सबसे बड़ा उपक्रम और देश की अर्थ व्यवस्था में सहायक है। बावजूद इसके रेल में यात्रा करने वाले यात्रियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं हासिल नहीं हैं। इसका कारण रेलवे अस्पतालों की बदहाल स्थिति है। टुंडला से लेकर कानपुर तक बीच में रेलवे का एक भी ऐसा अस्पताल नहीं है जहां मरीज को प्राथमिक उपचार दिया जा सके। हैरत की बात देखिए। इटावा के रेलवे अस्पताल में बीते 56 साल से एक भी मरीज भर्ती नहीं हुआ।

कोई मुसीबत आए तो कहां जाएं
हाल ही में पावर ग्रिड फेल होने से दर्जनों ट्रेनें जहां की तहां घंटों खड़ी रहीं। ऐसे में कई मरीज बीमार हुए लेकिन रेलवे अधिकारियों के पास कोई भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी। कोई विकल्प भी नहीं था। ट्रेनों में यात्रा करते समय जब भी किसी यात्री की हालत बिगड़ती है तो रेलवे डाक्टर सिर्फ प्राथमिक उपचार भी मुहैया नहीं करा पाते। गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल रिफर कर दिया जाता है। जिले में बने रेलवे अस्पताल में न तो भर्ती करने की व्यवस्था है न ही अन्य अत्याधुनिक उपकरण की।

56 साल बाद भी मरीज भर्ती करने की सुविधा नहीं
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर रेलवे द्वारा सिर्फ खाना पूरी की जा रही है। टूंडला-कानपुर के बीच इटावा में बने रेलवे अस्पताल में इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। सिर्फ एक डाक्टर के कंधे पर लाखों यात्रियों व हजारों रेलवे कर्मचारियों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है। न आधुनिक उपकरण हैं और अन्य आधुनिक चिकित्सीय सेवाएं। इलाज के नाम पर सिर्फ जुकाम, खांसी, बुखार के इलाज तक की ही यहां व्यवस्था है। वर्ष 1956 में बने रेलवे अस्पताल में आज तक मरीजों को भर्ती करने की व्यवस्था नहीं हो सकी। सिर्फ ओपीडी के नाम पर मरीजों को कुछ दवाएं देकर चलता कर दिया जाता है।

इटावा रेलवे स्टेशन एक नजर में
इटावा से रोजाना गुजरने वाले यात्रियों की संख्या- करीब दो लाख
इटावा से रोजाना यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या - करीब 10 हजार
इटावा से रोजाना गुजरने वाली ट्रेनों की संख्या- करीब 150
इटावा रेलवे स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेनों की संख्या - करीब 54
इटावा रेलवे स्टेशन की प्रतिदिन की कमाई- औसत 7 लाख

रेलवे अस्पताल में मरीजों को भर्ती करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर कोई यात्री बीमार होता है तो उसे प्राथमिक उपचार दिया जाता है। अगर भर्ती करने की जरूरत पड़ती है तो उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया जाता है-डा. एएस देव, चिकित्साधिकारी, रेलवे अस्पताल

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