...इस रात की अब सुबह नहीं

Etawah Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
इटावा। दर्दनाक हादसे की खबर लिखते समय दिमाग पूरी तरह सुन्न है। शवों के ढेर में तब्दील हो चुके अपनों को खो देने का बेपनाह दर्द, अनाथ हो चुके बच्चों की चीखें, जवान बेटे को खो चुकी मां की तड़प, चूड़ी तोड़ती विधवा का विलाप, गांव की बहू बेटियों और नातिनों के एक साथ पड़े 12 शवों का मंजर बताने को शब्द नहीं मिल रहे। दिमाग में कुछ रह गया है तो बस कान के पर्दे फाड़ देने को व्याकुल तड़पती चीखें।
इटावा के बरालोकपुर गांव में बेकाबू ट्रक ने मौत का जो तांडव किया, उसकी हकीकत पूरी रात 8 घंटे तक देखने के बाद आंखें बुरी तरह बोझिल है। यदि कुछ रह रह कर बार-बार आंखों के सामने तारी हो रहा है तो सड़कों पर बेतरतीब पड़ी लाशें, पानी की तरह बहा खून, जान बचाकर भागते समय छूटी चप्पलें और गुस्साए लोगों का ट्रक के ड्राइवर को पीट पीटकर मार डालने का दृश्य। किसी की मां, बेटी, किसी की बहू तो किसी की पत्नी गांव के अंदर से होकर जाते हाइवे पर 200 मीटर की दूरी तक सिर्फ मांस के लोथड़े में तब्दील हुए पड़े थे। घरों में शौचालय न होने की वजह से खेतों में जाने के लिए अंधेरे का इंतजार करती इन महिलाओं को क्या पता कि उनके लिए अब इस रात की सुबह नहीं होगी।
गांव के 80 साल के रामस्वरूप की छाती में जैसे दर्द का दरिया उमड़ रहा हो। घर की चार महिलाओं की एक साथ लाशें देखकर रामस्वरूप के बेटे हरिशंकर की आंखें मानों पथरा गई थीं रामस्वरूप की पत्नी कुंवरश्री (55), बहू प्रमिला (35), नातिन वर्षा (16) और नीलू (14) की मौत होने से घर में महिला के नाम पर बेटी मोहिनी बची है जो जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। रामस्वरूप अपनी पनातिन वर्षा को झकझोर कर बार-बार उठाने की कोशिश करता, पर वर्षा कहां उठी। मृतक आश्रित के नाम पर दो लाख का चेक लेते समय जैसे हाथ जड़ हो गए हों। एक ही परिवार में मौत का दूसरा नृत्य रामदेव के घर पर हुआ। रामदेव की पत्नी बिट्ठन और छोटे भाई रामतीरथ की पत्नी नेमा (देवरानी-जेठानी) एक साथ दुनिया छोड़ गईं। बिट्ठन सात माह की गर्भवती भी थी। घर में पहले बेटे की खुशियां मातम में बदल गईं। ननद-भौजाई रंजना और रीना की मौत से रामनाथ के घर पर मातम पसरा है। शनिवार की रात इस गांव की महिलाओं पर मौत कहर बन कर टूटी।
नाते रिश्तेदारों को अपनों के शव ढूंढे नहीं मिले। चेहरे से ढंके शवों को अपना समझ लोग वहीं फूट फूटकर रोते रहे। शनिवार की पूरी रात, इतवार का पूरा दिन इस गांव की गली गली में सिर्फ चीखें सुनाई देती रहीं। बीते 24 घंटे से इस गांव में चूल्हा नहीं जला है। जले भी कैसे चूल्हा जलाने वाली खुद चिताओं में जो जल गईं। घर घर शौचालय बनाने की सरकारी योजना काश इस गांव तक पहुंची होती तो शायद आज इन घरों में चूल्हे जल रहे होते।

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