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अस्पताल मालामाल, मरीज बेहाल

Etawah Updated Wed, 04 Jul 2012 12:00 PM IST
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इटावा। भारी मुनाफा के लालच में गली मोहल्लों में खोले गए अधिकतर नर्सिंगहोम व अस्पतालों में इलाज के माकूल इंतजाम नहीं हैं। कई जगह तो अप्रशिक्षित नर्सेज, कंपाउंडर के सहारे, तो कहीं वार्ड ब्वाय के सहारे मरीज छोड़ दिए जाते हैं। ज्यादातर पैरामेडिकल स्टाफ तो ट्रेंड नहीं है। जब तक वश में रहा तो इलाज किया, केस बिगड़ा तो हाथ खड़े कर दिए। इसके चलते आए दिन नर्सिंगहोमों पर लापरवाही के आरोप लगते रहते हैं। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमें के आला अधिकारी कभी यह जानने की कोशिश नहीं करते हैं कि अस्पतालों में व्यवस्थाएं ठीक चल रही हैं या मरीजों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है।
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समय दोपहर 12:00 बजे, दिव्यांशी हास्पिटल
महिला-पुरुष व नवजात सब एक साथ भर्ती
बीस बेड वाले इस अस्पताल में सभी मरीज एक सुरंगनुमा वार्ड में भर्ती दिखे। वार्ड की छत पर टिनशेड था। 45 डिग्री तापमान में टीनशेड के नीचे क्या हाल होता है यह बताने की जरूरत नहीं है। वार्ड में हड्डी रोगी, नव प्रसूताएं व बच्चे भर्ती थे। रोशनी की व्यवस्था सिर्फ लाइटों के सहारे दिखी। हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. एमएस पाल व स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. शीला पाल अपने-अपने कमरों में ओपीडी के मरीज देख रहे थे। रिसेप्शन काउंटर पर बैठी लड़की सहित अन्य स्टाफ ड्रेस में नही थे। अस्पताल में कहीं भी रजिस्ट्रेशन नंबर लिखा नजर नहीं आया। अस्पताल परिसर में एक कर्मचारी घरेलू गैस सिलेंडर से कॉटन, पट्टी स्टरलाइज कर रहा था। तीमारदारों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। तीमारदार धूप से बचने के लिए खुले में पेड़ के नीच बैठे हुए थे। अस्पताल परिसर में ही मेडिकल स्टोर के साथ पैथालॉजी सेंटर नजर आया। स्टाफ से पूछा गया कि क्या वह ट्रेंड है तो वह बात को टाल गए। टीम को देखकर एक तीमारदार बोला स्टाफ मरीजों के प्लास्टर ज्यादा करता है। पुरुषों के साथ भर्ती प्रसूता व उनके नवजात बच्चों को देखकर संक्रामक फैलने के खतरे से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।
अस्पताल में टीनशेड पड़ा है, क्या करूं किसी पैसे वाले घराने से नहीं हूं। स्टाफ 12 लोगों का है। इनमें आधे ट्रेंड हैं। नर्सिंग स्टाफ लंबे समय से यहीं कार्य कर रहा है। हालांकि उनके पास कोई डिग्री डिप्लोमा नहीं है। पैथालॉजी में मरीजों की जांच खुद करते हैं और खुद के स्टोर से उन्हें दवा देते हैं। सारा काम मेरी देखरेख में होता है-डा. एमएस पाल प्रभारी दिव्यांशी हास्पिटल
दुकान की तरह दिखा
समय-12:45 बजे बीएलएम हास्पिटल
अस्पताल बाहर से दुकान की तरह नजर आया। फोटो खींची तो साधारण कपड़े में खड़ा एक युवक उलझने लगा, बोला फोटो क्यों खींची। डॉ. आर यादव अपने कमरे में बैठे थे उनके नाम के आगे एमबीबीए एमडी लिखा था, लेकिन अस्पताल के बोर्ड पर पित्त की थैली में पथरी, अपेडिंक्स, हड्डी व आंतों के सारे आपरेशन, दमा, खांसी, मलेरिया, हैजा, टाइफाइड, ज्वर, खून की जांच, आपरेशन द्वारा प्रसव, बच्चेदानी का आपरेशन आदि सुविधाएं बड़े-बड़े शब्दों में लिखीं थीं। इनके बोर्ड में कहीं भी रजिस्ट्रेशन संख्या लिखी नहीं दिखी। डाक्टर साहब के कमरे में पहुंचे तो उन्होंने कहा कि थोड़ी देर बाद अंदर आना मरीज से गोपनीय बात कर रहा हूं। बिल्डिंग के तलघर में मरीजों के लिए बेड पड़े थे। इधर उधर देखा तो स्टाफ नजर में नहीं आया। एक लड़की से पूछा स्टाफ नहीं है तो जवाब मिला, मैं हूं न। जींस टाप में बैठी यह लड़की बोली आप कहां से हैं। परिचय दिया तो बोली, डाक्टर साहब से मिल लो। डाक्टर से पूछा, आपके नाम के आगे तो एमडी लिखा है, लेकिन बोर्ड पर तो कई तरह के आपरेशन की सुविधा दर्ज हैं। क्या आपरेशन आप ही करते हैं तो जवाब मिला, नहीं इस तरह के केस आने पर अन्य डाक्टरों को कॉल पर बुलाया जाता है। कितना नर्सिंग स्टाफ है जवाब मिला 6 लोगों का। क्या सभी डिग्री डिप्लोमाधारी ट्रेंड हैं। बोले ट्रेंड तो हैं, पर डिग्री नहीं है। लंबे समय से अस्पतालों में काम कर रहे हैं। अभ्यास हो गया है।

ट्रेंड होने की अवधि
नर्सेज ट्रेनिंग-साढ़े तीन साल (तीन साल की जनरल ट्रेनिंग, छह माह मिडवाइटरी)
एएनएम- डेढ़ साल
ओटी टेक्नीशियन, लैब टेक्नीशियन, फार्मेसिस्ट : 2-2 साल की ट्रेनिंग
(हमारा इरादा किसी की छवि बिगाड़ना या उसे निशाना बनाना नहीं है। हम तो शहर में चल रहे नर्सिंगहोम व अस्पताल के मानकों और उसकी हकीकत की तस्वीर बयां कर रहे हैं। अब पाठक फैसला करें कि उन्हें क्या करना है।)

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