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शासनादेश से आढ़ती असमंजस में

Etawah Updated Sun, 06 May 2012 12:00 PM IST
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इटावा। बारदाना के अभाव में सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीद ठप पड़ी है। आढ़तियों के जरिए खरीद का फार्मूला भी काम नहीं आ रहा। आढ़ती नए शासनादेश को लेकर असमंजस में है। गेहूं की खरीद संबंधी जो नियमावली बनाई गई है। उसमें कई बिंदु ऐसे हैं जो उन्हें खल रहे हैं।
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दरअसल शासन द्वारा इस बाबत जारी शासनादेश में आढ़तियों को सबसे पहले गेहूं की खरीद करने के लिए फर्म का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उसके बाद ही वह गेहूं की खरीद कर सकेंगे। आढ़तियों को किसानों का भुगतान खुद करना होगा। यह रकम किसानों को एकाउंट पेई चेक के जरिए देनी होगी। बारदाना की भी अपने स्तर से व्यवस्था करनी होगी। हालांकि बाद में उसको 53 रुपए प्रति कुंतल का भुगतान किया जाएगा। मंडी टैक्स व वैट टैक्स चुकाना होगा। सिर्फ छनाई व सफाई का चार्ज आढ़ती किसान से ले सकते हैं। मुख्य बात तो यह है कि खरीदने के बाद गेहूं को तब तक आढ़ती को अपने पास रखना होगा जब तक कि सरकार भंडारण की व्यवस्था नहीं कर लेती।
मानक कौन तय करेगा
आढ़ती शिवेंद्र कुमार कहते हैं कि सरकारी खरीद के लिए मंडी में कोई ऐसा सरकारी कर्मचारी नियुक्त किया जाए जो मौके पर किसान के गेहूं का मानक तय कर सके। क्योंकि जब वह खरीद करने के बाद गोदाम पर ले जाते हैं तो मानक को लेकर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। खरीदे गए गेहूं के उठान की समय सीमा निर्धारित की जाए।
बारदाना के रेट ठीक नहीं
आढ़ती अरविंद कुमार कहते हैं कि सरकारी खरीद के लिए बारदाना सरकार उपलब्ध कराए। बाजार में बारदाना 70 रुपए प्रति कुंतल क ी दर से मिल रहा है। जबकि सरकारी रेट कम तय किया गया। खरीदा गया गेहूं दस दिन के अंदर उठान कर लिया जाना चाहिए। कच्चे आढ़तियों पर भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती।
ट्रांसपोर्टिग कैसे होगी
आढ़ती उपदेश कुमार पप्पू कहते हैं कि गेहूं की खरीद के बाद उसे उठाकर गोदाम तक पहुुंचाने की व्यवस्था के लिए अलग से ट्रांसपोर्टिग का ठेका होना चाहिए। क्योंकि तय भाड़े और बाजार में भाड़े के रेट में काफी अंतर है। ऐसे में बाद में उन्हें नुकसान झेलना पड़ेगा। इससे अच्छा खरीद ही न करो।
कितने दिन रखना होगा
आढ़ती अनुराग गुप्ता कहते हैं कि शासनादेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कितने दिन गेहूं उनके पास रखा रहेगा। गेहूं की खरीद करने के बाद यदि उसका भंडारण अधिक समय तक किया तो उसको सुरक्षित करने क ी भी उन्हें ही कवायद करनी होगी। घुन आदि लग गया तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा।
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