ताल-तलैया सूखे, भटक रहे पशु-पक्षी

Etawah Updated Mon, 05 May 2014 05:30 AM IST
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इटावा/भरथना/ऊसराहार। भीषण गर्मी के चलते भूजल स्तर तेजी से नीचे खिसक रहा है। वहीं गांवों के ताल-तलैया, पोखर सूख चुके हैं। इंसान के साथ ही पशु-पक्षी और आवारा जानवर प्यास बुझाने के लिए भटक रहे है। सारस पक्षी विहार सरसईनावर की इकलौती झील सूख जाने से संरक्षित पक्षियों के साथ राष्ट्रीय पक्षी मोर के जीवन पर संकट के बादल छाए हैं। भरथना, चकरनगर, ऊसराहार क्षेत्र में पानी के लिए हाहाकार मचना शुरू हो गया है। स्थितियाें क ो भांपते हुए डीएम ने अधीनस्थोें की मीटिंग लेकर हैंडपंपों क ी मरम्मत कराने और सूखे पड़े तालाबों को ट्यूबवेलों से भराने के लिए 15 दिन का समय दिया है। इसके बाद भी यदि शिकायत आती है तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर ध्यान न दिए जाने और भू-गर्भीय जल के अंधाधुंध दोहन से धरती के अंदर का पानी तेजी से घट रहा है। यही कारण है कि जिले भर में 25 फीसदी से अधिक हैंडपंप और नलकूप साथ छोड़ चुके हैं। भीषण गर्मी के कारण तालाबों और पोखरों का पानी भी सूख चुका है। चकरनगर, ऊसराहर क्षेत्र डेंजर जोन में आ गए हैं। इसके अलावा भरथना में भी हालात खराब बताए जा रहे हैं। ऊसराहार क्षेत्र के सरसईनावर सारस पक्षी विहार की इकलौती झील का पानी सूख जाने से इन पक्षियों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। हजारी महादेव मंदिर प्रबंधन द्वारा गड्ढों में पानी भरकर सारसों की प्यास बुझाई जा रही है। बता दें कि इस पक्षी विहार में भारतीय महाद्वीप में पाए जाने वाले सारसों में 20 फीसदी निवास करते हैं। यहां पर पर्यटन क्षेत्र को विकसित करने के लिए 55 लाख रुपये की लागत से भवन का निर्माण तो करा दिया गया है, लेकिन सारस पक्षियों को गर्मी से बचाने के लिए पानी की व्यवस्था के नाम पर सरकार का खजाना खाली है। यहां बहुतायत में राष्ट्रीय पक्षी मोर भी पाए जाते हैं। मोर एक ऐसा पक्षी है जो गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाता, 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक का तापमान होने पर मोर क ो पानी की आवश्यकता होती है। ऐसा नहीं होने पर मोरों की गर्मी से मौत की आशंका बढ़ जाती है। सरसईनावर से ताखा की ओर जाने वाला गांगसी रजबहा भी सूखा पड़ा है।
बीहड़ क्षेत्र चकरनगर के हालात तो और भी बदतर हैं। ताल-तलैया तो दूर जीवनदायिनी समझी जाने वाली यमुना और चंबल नदियों में पानी का स्तर तेजी से कम हो रहा है। भूजल स्तर 250 फीट से भी नीचे चला गया है। अधिकतर हैंडपंप, नलकूप सूख चुके हैं। चकरनगर के जिस गांव में गत वर्ष डायरिया से चार मौतें हो गई थीं, उस नदा गांव में टंकी से पानी मिल रहा है लेकिन गढ़ाकास्ता, सिरसा, बिंडवा, नगला महानंद, चौंरेला, सिंडोस, सहसों आदि एक दर्जन से अधिक गांवों में पाइप लाइन ध्वस्त हो जाने से पानी का संकट है। सिरसा गांव में टंकी तो बन गई है लेकिन पाइप लाइन नहीं पड़ी। क्षेत्र में 40 फीसदी से अधिक हैंडपंप खराब पड़े हैं। हजारों की संख्या में पशु नदियों के पानी पर आश्रित हैं। आवारा पशु और पक्षियों का बुरा हाल है। सियार, लोमड़ी, जंगली सूअर, कुत्तों, नीलगाय आदि के अलावा मोर और अन्य पक्षियों को पानी के लिए भटकते देखा जा रहा है।
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भीषण गर्मी है, सूखे हुए तालाबों क ो नलकूपों से भरवाने और खराब पड़े हैंडपंपों की मरम्मत कराने के लिए संबंधित विभागोें के अधिकारियाें को अवगत करा दिया गया है। नहरों और रजबहों में पानी छोड़ने के लिए सिंचाई विभाग के अधिकारियों क ो निर्देशित किया गया है। किल्लत वाली जगहों पर नगर पालिका, नगर पंचायताें को टैंकरों से पानी भेजने के लिए आदेशित किया गया है। -विद्याभूषण, डीएम

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