11 अक्टूबर को विश्व दृष्टि दिवसः दस साल में एक भी दानदाता नहीं

Etawah Updated Wed, 10 Oct 2012 12:00 PM IST
इटावा। 11 अक्तूबर को दुनिया भर में अंधता निवारण दिवस मनाया जाएगा, लेकिन जिले में अंधता निवारण दिवस का मतलब सिर्फ मोतियाबिंद के आपरेशन तक ही सीमित है। सरकार नेत्र दान को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपए का बजट विज्ञापनों व व्यवस्थाओं पर खर्च करती है लेकिन यहां तो बीते दस वर्षों में एक भी व्यक्ति ने नेत्रदान नहीं किया। स्वास्थ्य विभाग के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है जिसमें किसी ने अपनी आंख दान की हो। स्वास्थ्य विभाग के पास ऐसा कोई रिकार्ड भी नहीं है जिसमें किसी की आंखें ट्रांसप्लांट हुईं हों। हालांकि कुछ वर्ष पहले एक व्यक्ति की एम्स दिल्ली के डाक्टरों ने आंख ट्रांसप्लांट की थी। अब उस व्यक्ति की भी मौत हो चुकी है। विभागीय अधिकारी इसके पीछे स्पेशलिस्ट डाक्टरों की कमी व संसाधनों का अभाव बताते हैं। सरकारी अस्पतालों में न तो उपचार की आधुनिक पद्धति है न ही संसाधन। मोतियाबिंद के आपरेशन भी पुरानी तकनीक से हो रहे हैं।
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एनजीओ भी सक्रिय नहीं हैं
जिले में करीब सौ के आसपास छोटे-बड़े एनजीओ संचालित हैं। ये छोटे-छोटे कार्र्यक्रम गोष्ठियों तक सीमित हैं। नेत्रदान के प्रति किसी एनजीओ ने सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। कुछ एनजीओ ने लोगों से नेत्र दान से संबंधित शपथपत्र तो भरवा लिए लेकिन मरने के बाद आंखें दान हुईं या नहीं जानने की कोशिश नहीं की।
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मोतियाबिंद आपरेशन में पुरानी तकनीक
अंधता निवारण के प्रचार में करोड़ों रुपए खर्च करने वाली सरकार संसाधनों की ओर ध्यान नहीं दे रही है। जिला अस्पताल में आज भी मोतियाबिंद के आपरेशन वर्षों पुरानी तकनीक से हो रहे हैं। फेको विधि आज भी जिला अस्पताल से दूर है। अस्पताल प्रशासन कहता है कि संसाधन ही नहीं तो नई विधि का प्रयोग कैसे करें।
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- जागरूकता में भी पीछे स्वास्थ्य विभाग
अंधता निवारण के लिए जनजागरुकता अभियान बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग अभियान में काफी पीछे है। अंधता निवारण को लेकर जिला अस्पताल व सीएमओ कार्यालय के आसपास वाल पेंटिंग तो है लेकिन यह वालपेटिंग करीब डेढ़ वर्ष पुरानी है। विभाग ने जमीनी स्तर पर प्रचार के लिए कोई कार्य ही नहीं किया। किया होता विज्ञापनों में जिलाधिकारी पी गुरुप्रसाद का नाम जो लगभग एक वर्ष से जिले में तैनात हैं जरूर लिखा होता। विज्ञापनों में जिलाधिकारी जीएस प्रियदर्शी, तत्कालीन सीएमओ, तत्काल समन्वयक के नाम लिखा हैं।
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सुविधा की कमी बनी बाधक
विभिन्न सामाजिक संगठनों ने नेत्रदान कराने का प्रयास तो किया लेकिन संसाधनों व सुविधाओं की कमी के कारण वह सफल नहीं हो पाए। बिना संसाधनों एवं सुविधाओं के नेत्रदान संभव नहीं है। न तो जिले में नेत्रदान के लिए कोई टीम है और न ही आंखों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था। अगर कोई नेत्रदान करता भी है तो उसकी मौत के बाद जब तक आगरा-कानपुर व लखनऊ से टीम यहां पहुंचेगी। आंख सुरक्षित रहने की संभावना भी कम हो जाएगी। लोगों में भी जागरूकता की कमी है। स्वास्थ्य महकमे का सहयोग मिले और संसाधनों की व्यवस्था हो तो निश्चित तौर पर नेत्रदान को जिले में बढ़ावा मिल सकता है।-मीरा अग्रवाल, प्रभारी सहेली ग्रुप जायंट्स इंटरनेशनल
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एक्सपर्ट व्यू
मरने के बाद गर्मियों में 6 घंटे और सर्दी के मौसम में 12 घंटे के भीतर आंख सुरक्षित की जा सकती है। अच्छे रिजल्ट के लिए 24 घंटे में आंख ट्रांसप्लांट हो जानी चाहिए।-डॉ. रेखा गुप्ता, आई सर्जन

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