कृषि विश्वविद्यालय के लिए नहीं हो रही पहल

Deoria Updated Thu, 24 Oct 2013 05:39 AM IST
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देवरिया। गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व स्थापित बाबा राघवदास पीजी कॉलेज शासन और जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार हो गया है। कृषि क्षेत्र में शोध कराने वाला यह पूर्वांचल का अकेला कॉलेज है। अस्सी के दशक में यहां विदेशों से छात्र कृषि की पढ़ाई करने आते थे। विश्वविद्यालय बनने का मानक पूरा करने के बाद भी पहल के अभाव में कृषि विश्वविद्यालय का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है।
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वर्ष 1954 में कलक्टर ने केन कॉलेज के नाम से इसकी स्थापना की थी। प्रदेश में सर्वाधिक गन्ना पैदा होने के कारण कॉलेज में कृषि की पढ़ाई शुरू की गई। उस समय यह आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध था। बाद में 1957-58 में गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद यह इससे संबद्ध हो गया। यहां बीएससी और एमएससी के अलावा पीएचसी भी कराई जाती है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय ही नहीं, पूर्वांचल में कृषि में शोध कराने वाला यह इकलौता कॉलेज है। कॉलेज के पास अपना 64 एकड़ का कृषि फॉर्म, 14 एकड़ में कैंपस, चार एकड़ में बाग है। कॉलेज प्रशासन के अनुसार, अस्सी के दशक में यहां नेपाल, भूटान, इथोपिया, ईरान से छात्र कृषि की पढ़ाई करने आते रहे हैं। 1985 तक कॉलेज का स्वर्णिम काल था। वर्तमान में असोम, सिक्किम, नागालैंड, हरियाणा, आंध्रप्रदेश के छात्र कृषि की पढ़ाई कर रहे हैं। बीएससी में कुल 120 सीटाें पर प्रवेश के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। एमएससी में चार विभाग हैं। जिसमें कृषि अर्थशास्त्र, कीट विज्ञान, प्रजनन एवं आनुवांशिकी, कृषि प्रसार और नई तकनीक में 15-15 सीटें निर्धारित हैं। इन चारों विषयों में शोध कॉलेज के प्रोफेसर कराते हैं।
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