जनपद में तेजी से बढ़ रही एड्स रोगियों की संख्या

Deoria Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
देवरिया। जनपद में एड्स पर लगाम नहीं लग पा रहा है। रोकने के तमाम कवायद के बीच ही यह तेजी के साथ फैलती जा रही है। स्थिति यह है कि एड्स से ज्यादा प्रभावित प्रदेश के पांच जिलों में देवरिया का भी नाम शामिल है। बीते वर्ष यह जनपद इलाहाबाद के बाद दूसरे नंबर पर था, लेकिन अब यह नंबर वन की पायदान पर है। इसके बाद भी पॉजिटिव पाए जाने वाले व्यक्ति का इलाज तब तक शुरू नहीं किया जाता, जब तक वह मौत के मुहाने पर नहीं पहुंच जाता है और उसका काउंट सेल 350 से नीचे गिरने लगता है। संसाधनों की स्थिति यह है कि सबसे महत्वपूर्ण मशीन सीडी फोर मशीन तक महकमे के पास नहीं है।
एड्स के प्रसार को रोकने के लिए आज की तारीख में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सलेमपुर, रुद्रपुर, लार, बरहज, गौरी बाजार, पथरदेवा, भाटपार और पुरुष एवं महिला जिला चिकित्सालय के एकीकृत परामर्श एवं निदान केंद्र संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा एक संस्था से भी मदद ली जा रही है। पॉजिटिव पाए जाने वाले मरीजों के इलाज करने के लिए एआरटी केन्द्र भी जिला चिकित्सालय में मौजूद है।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2006 में 63 महिला और पुरुष पॉजिटिव पाए गए। वर्ष 2007 में 210, वर्ष 2008 में 248, वर्ष 2009 में 386, वर्ष 2010 में 321, वर्ष 2012 में 474 और वर्ष 2012 में अक्टूबर माह तक 553 पॉजिटिव पाए गए हैं। दिसंबर तक यह 600 से ज्यादे हो जाने की उम्मीद है। इसके अलावा 55 बच्चे, 31 बच्चियां और गर्भवती महिलाएं भी पॉजिटिव पाई गई हैं। 29 बच्चे और 15 बच्चियां दवा ले रहीं हैं। 1286 स्त्री-पुरुष ऐसे हैं जिनका काउंट सेल 350 से नीचे पहुंच गया है। इनमें से 851 एआरटी केन्द्र से दवा ले रहे हैं। यह आंकड़ा उन व्यक्तियों पर आधारित है जो जांच कराने सरकारी केन्द्रों पर पहुंचे हैं। सूत्र बताते हैं कि इससे कहीं ज्यादा संख्या जनपद में है।
एड्स कंट्रोल सोसाइटी ने प्रदेश में सर्वाधिक एड्स रोगियों वाले पांच जिलों इलाहाबाद, देवरिया, मऊ, इटावा और बांदा जनपद को चिहिन्त किया है। बीते वर्ष देवरिया जनपद दूसरे नंबर पर था, लेकिन अब यह नंबर वन हो गया है। केन्द्र सरकार से नियुक्त उप्र में एड्स का काम देख रही डॉ. रिशु की अध्यक्षता में सितंबर 2012 में एक बैठक लखनऊ में हुई। इस बैठक में सभी जिलों के डाटा मैनेजर्स उपस्थित थे। एड्स रोगियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई गई थी। परंतु यह चिंता बैठक तक ही सीमित रही। स्थिति यह है कि रोगियों के खून में डब्ल्यूबीसी की संख्या की जांच करने वाली सीडी फोर मशीन ही जनपद में नहीं है। यह मशीन केवल गोरखपुर में मौजूद है। इतना ही नहीं एआरटी केन्द्र पर अभी छह महीने पहले तक पॉजिटिव पाए जाने वाले रोगी का इलाज तब तक शुरू नहीं होता था, जब तक उसका काउंट सेल 250 से नीचे नहीं पहुंच जाता था। करीब छह माह से इलाज तब किया जा रहा है जब काउंट सेल 350 से नीचे गिरने लगता है। एआरटी के काउंसलर डॉ. चंद्र प्रकाश त्रिपाठी के मुताबिक स्वस्थ्य व्यक्ति के खून के नमूने में 1200 से 1500 डब्ल्यूबीसी पाई जाती है। 800 से नीचे गिरने पर आदमी एड्स के चपेट में आ जाता है।

हौसले से आम आदमी की तरह कर रहा जीवनयापन
सदर ब्लाक क्षेत्र का रहने वाला एक सरकारी कर्मचारी एड्स के चपेट में आ गया। उसका काउंट सेल 100 से नीचे गिर गया था, लेकिन उसने हौसला नहीं छोड़ा। वर्ष 2007 से दवा लेनी शुरू की और आज उसका काउंट सेल 950 के आसपास है। ऐसे 100 लोग हैं जो मौत के मुंह से निकलकर सामान्य जीवन जी रहे हैं।

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