अंग्रेज़ीदां के लिए नोट पर छपे गांधी ही बहुत

Deoria Updated Thu, 04 Oct 2012 12:00 PM IST
दो अक्टूबर आते ही चंडीगढ़ और उससे पहले इलाहाबाद के उन पाठकों की याद ज़रूर आती है, जो अख़बार के दफ्तरों को फोन करके इस रवैये पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर करते कि गांधी जयंती के रोज़ ही लाल बहादुर शास्त्री की भी जयंती होने के बावजूद मीडिया में उनका ज़िक्र क्यों नहीं आता? पहले तो इस किस्म की जबरदस्ती पर झुंझलाहट-सी हुई थी मगर थोड़ा गौर करने पर लगा कि उनकी इस तरह की अपेक्षा में तो कोई हर्ज़ नहीं। उनका आग्रह दो महापुरुषों की शख्सियत को बराबर करके देखने का नहीं था, वे तो बस दूसरे को भुला नहीं देने के हामी थे। पिछले कुछ वर्षों से अख़बार देखता हूं तो लगता है कि उनके टोकने का सार्थक असर हुआ है।
अपनी मां के साथ घर के काम में हाथ बंटाने आई गौरी से मंगलवार की सुबह ही पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं गई तो तुरंत जवाब मिला-गांधी जी का जन्मदिन है और स्कूल की छुट्टी है। दूसरे दर्जे में पढ़ने वाली गौरी य़ह पूछने पर खामोश हो गई कि गांधी के अलावा आज और किसका जन्मदिन है? उसे अपना अख़बार देकर शास्त्री की तस्वीर दिखाई, बताया। महसूस किया कि स्कूलों में भी दो अक्टूबर का महत्व सिर्फ गांधी के लिहाज से है।
पुराने पाठकों के तगादे याद करके अपने अख़बार पर तो इतरा लिया मगर जिस बात पर बिल्कुल ग़ौर नहीं किया, वे शहर में आने वाले अंग्रेज़ी के अख़बार थे। शाम को दफ्तर में था कि चंद्रभूषण अंकुर का फोन मिला। उन्होंने अपने घर आने वाले अंग्रेज़ी अख़बार का हवाला देकर उलाहना दी, ‘पहला पेज देखिए, छुट्टी की सूचना छोड़कर गांधी का कोई ज़िक्र नहीं है। सारे पन्ने देख डाले, कहीं कुछ नहीं। कोई तस्वीर तक नहीं।’ उनका मलाल यूनिवर्सिटी के ऐसे शिक्षक का मलाल भर नहीं था, जो फिल्मों में गांधी के चित्रण के गहन अध्ययन में जुटे हैं। वह एक पुराने अख़बारनवीस की शिकायत भर नहीं थी। वह तो अंग्रेज़ी अख़बार के उस पाठक का अफसोस और हैरानी थी, जिसे अख़बार का यह रवैया उम्मीद के एकदम उलट लगा। उन्हें जब यह बताया कि मेरे सामने ही रखे दूसरे अंग्रेज़ी अख़बार का भी यही हाल है तो उन्होंने हैरानी हरगिज़ नहीं जताई। कहा, ‘इससे उन्हें ज़रूर सीखना चाहिए, जिन्हें अंग्रेज़ी जर्नलिज्म बड़ी संजीदा और ज़िम्मेदार लगती हैं।’ बाद में देर तक सोचता रहा कि अगर यह लापरवाही होती तो किसी एक अख़बार में ही झलकती। मगर यहां तो दूसरों का रवैया भी ऐसा ही है। तो क्या यह सोच-समझकर तय किसी नीति का हिस्सा है? ऐसी नीति, जिसमें माना गया हो कि अंग्रेज़ी पढ़ने वालों के लिए अब गांधी प्रासंगिक नहीं बचे हैं। टॉम क्रूज़, दीपिका पादुकोण, राहुल बोस और संडे रन (ख़बर मंगलवार के अंक में!) वगैरह की फोटो-ख़बरों के बीच वाकई गांधी नहीं जंचते। वैसे भी मिनिस्ट्री ऑफ पॉवर, स्टील, दमन पंचायत वगैरह की ओर से गांधी की फोटो वाले विज्ञापन तो उन्होंने भी छापे हैं। तो यह आक्षेप नहीं लगा सकते कि अख़बार गांधीविहीन हैं। अंकुर जी वाला अख़बार एक बार फिर से देखा तो मालूम हुआ कि वे चूक गए थे। कैश फ्लो मैनेज करने का हुनर बताने वाले एक लेख के बीच छपी तस्वीर में गांधी मुस्कराते हुए मिल गए। हां, उसमें तमाम नोटों की तस्वीर में सबसे ऊपर वही दिखाई दे रहे थे। अंग्रेज़ी वाला तबका गांधी को याद तो करता है, बरतता भी है-हर रोज़।

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