दर्द की दास्तां बन गईं सुशीला

Deoria Updated Thu, 27 Sep 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। चीनी बनाने वाली सरैया मिल सुशीला सिंह की जिंदगी में मिठास तो नहीं घोल सकी अलबत्ता उनकी जिंदगी की सारी खुशियां छीन कर उन्हें ऐसे अंधेरे गलियारे में जरूर छोड़ दिया, जहां आंसू बहाने के सिवाय उन्हें दूसरा कुछ नहीं सूझ रहा। मिल ने पति की जिंदगी तो छीनी ही, उन्हें बचाने में बेटी के हाथ पीले करने के लिए पाई-पाई जोड़कर जो कुछ इकट्ठा किया था, वह भी नहीं बचा। मुफलिसी की मार के कारण बेटे की ख्वाहिशें नहीं पूरी कर सक ीं तो बेटा भी साथ छोड़ अनजाने रास्ते पर निकल गया और लौट कर घर नहीं आया। पिता की चिता को मुखाग्नि भी भतीजे ने दी। आज सुशीला दर्द की मुकम्मल दास्तां बन गई हैं।
हाड़ तोड़ मेहनत का कई माह का वेतन नहीं मिलने और सरैया चीनी मिल पर ताला लगने के बाद मिल में काम करने वाले कर्मचारियों का हाल क्या है, यह जानने पहुंची ‘अमर उजाला’ की टीम ने मिल कालोनी के एक छोटे से घर में प्रवेश किया तो चारों तरफ गम का सन्नाटा फैला था और एक कुर्सी पर बैठीं सुशीला रो रही थीं। दु:ख की इस घड़ी में उन्हें ढांढस बंधाने पहुंचीं उनकी दो सहेलियां माया और संध्या उन्हें चुप कराने की कोशिश में जुटी थीं। बकौल सुशीला, करीब तीन दशक पहले देवरिया के भाटपाररानी गांव (ससुराल) से निकलकर जब उन्होंने चीनी मिल कालोनी के छोटे से मकान में कदम रखा तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि कभी यही घर उन्हें काटने को दौड़ेगा। जनवरी 2012 से ही वेतन नहीं मिलने और मार्च में मिल पर ताला लगने के बाद से ही पति सुरेंद्र सिंह के चेहरे से खुशी गायब हो गई थी। पति की सेहत गिरने लगी। 26 जुलाई 12 को उन्हें तेज बुखार हुआ, जिसके बाद सरदारनगर के करमहां से अस्पतालों के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हुआ जो 19 अगस्त को लखनऊ के पीजीआई में उनकी अंतिम सांस के साथ खत्म हुआ। सुशीला बताती हैं कि पति सरैया चीनी मिल के अस्पताल में कंपाउंडर थे। तनख्वाह कम होने के बाद भी उनकी एक ही तमन्ना थी कि बेटे गौरव की ख्वाहिशें पूरी की जा सकें और बेटी गरिमा को उच्च शिक्षा दी जा सके। बेटे ने तो बाप की भावनाओं की परवाह नहीं की और घर छोड़ दिया। बेटी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरी और नौकरी कर आज पूरे घर का खर्चा भी संभाल रही है। वहीं पूरे कुनबे की खुशियां उजड़ने के बाद भी मिल के मालिकों ने न तो अपने कर्मचारी के आठ माह का बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और पीएफ के लाखों रुपये लौटाए न ही उनका हाल जानना मुनासिब समझा।

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