यहां पूर्वांचल के युवाओं को मिलता है मंच

Deoria Updated Tue, 25 Sep 2012 12:00 PM IST
सलेमपुर। पूर्वांचल के अलमस्त इलाके सलेमपुर की कई छवियां मशहूर उपन्यासकार विक्रम सेठ की कृति ‘ए सुटेबल ब्वाय’ में वर्णित सलेमपुर से मिलती है। यह कहानी भी एक सुटेबल ब्वाय की है। जिसने अपने साथियों के मदद से रंगकर्म की गलियों से उठती ‘थिएटर मर रहा है’ की आवाजों को ठिठक जाने पर मजबूर कर दिया। वाई शंकर मूर्ति आज भी जिले के अलावा पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं के अंदर छुपी प्रतिभा को निखारने और मंच देने का कार्य करते हैं। मंच से जुड़े दर्जनों युवक और युवतियां आज फिल्मों और धारावाहिकों में कार्य कर रहीं हैं।
59वर्षीय वाई शंकर मूर्ति आंध्र प्रदेश के हैदराबाद के मूल निवासी हैं। वह आंध्र प्रदेश के एक महाविद्यालय से बीकाम करने के बाद रोजगार के लिए मुंबई पहुंचे। 1979 में मुंबई में स्क्रैप फिल्म का कारोबार शुरू किया। चार साल बाद 1983 में उन्हें यूपी के कुछ लोग मिले और काफी धनिष्टता बढ़ गई। यूपी के मित्रों के माध्यम से वे फैजाबाद, हरदोई और आजमगढ़ जैसे जगहों पर टूरिंग टाकीज चलाते हुए सलेमपुर में पहुंचे और सलेमपुर के सूरज प्रसाद जायसवाल के मकान में टूरिंग टाकीज खोले। उस समय मकान का किराया ढाई हजार दे रहे थे। नगर के लोगों के मदद से टाकीज शानदार चला। यहां के लोगों के सहयोग से मूर्ति ने ठाकुर नगर वार्ड में वर्ष 1988 में खुुद का मेनका पिक्चर हाल खोला और इसी को सजाने संवारने जुट गए। 1996 में संस्कार भारती संस्था का इन्हें अध्यक्ष बनाया गया। 2001 में मेनका पिक्चर कैंपस में शेखर सिंह की ओर से प्रस्तुत कबीर का पहला नाटक प्रस्तुत हुआ। जिसे देख मुझे प्रेरणा मिली और युवाओं के सहयोग से सलेमपुर की धरती के खुशबु को बटोरने में जुट गए। कैंपस में ग्रामीण अंचलों में छुपी प्रतिभाओं को खोजकर निखारने का कार्य शुरू किया। वर्ष 2002 में नगर के सलाहाबाद वार्ड में एक और थिएटर बनवाया जो योगी थिएटर के नाम से चलता था। इसी बीच उनकी मुलाकात रंगकर्म की गलियों में बेचैन घूम रहे एक नौजवान मानवेंद्र त्रिपाठी से हुई जो थिएटर के नए चित्र रचने के लिए कैनवास की तलाश में गोरखपुर, कुशीनगर जैसी शहरों से भटकते हुए सलेमपुर पहुंचे थे। मूर्ति और मानवेंद्र 2005 में सांस्कृतिक संगम संस्था खोला और सलेमपुर के अलावा पूर्वांचल के कलाकारों को मंच देना शुरू किया। सांस्कृतिक संगम का पहली बार योगी थिएटर में ‘मेघदूत पूर्वांचल यात्रा’ का नाटक प्रस्तुत किया था जो तीन दिन तक चला था। नाटक को देखने के लिए 100 से 150 रुपये में टिकट बिका था। वाई शंकर मूर्ति कहते हैं कि इधर छह वर्षों में मंच पर 306 नाटक प्रस्तुत हो चुके हैं।
अखिर आप क्यों नहीं गए गांव
उन्होंने बताया कि सलेमपुर पहुंचने के बाद यहां के लोगों का इतना सहयोग और प्यार मिला कि गांव की माटी मुझे भूल गई और यहां का निवासी हो गया। संस्था की ओर से मुंबई में इन दिनों फिल्म की शूटिंग चल रही जिसका नाम नहीं रखा गया है। फिल्म में संस्था और सलेमपुर की माटी से जुड़ी कहानी होगी। मेरा उद्देश्य है कि मंच के माध्यम से युवाओं को आगे बढ़ाया जाए। इन दिनों संस्था में 55 कलाकार कार्य कर रहे हैं। जिसमें 15 युवतियां हैं सभी कलाकार पूर्वांचल के ही रहने वाले हैं। संस्था से जुड़ी गोरखपुर की शुप्रिया गुप्ता को पहली बार ससुरा बड़ा पइसा वाला फिल्म में कार्र्य करने का मौका मिला था। जो कई फिल्मों में कार्य कर चुकीं हैं। परितोष कुमार, तूलिका उपाध्याय, परितोष त्रिपाठी, सलेमपुर के बलदाऊ विश्वकर्मा ,राकेश गुप्ता, जहीर, संजय मिश्र भी कई धारावाहिक और फिल्मों में कार्य कर चुके हैं।

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