84 वर्ष बाद आया है कल्याणकारी नागपंचमी

Deoria Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
देवरिया। इस वर्ष नागपंचमी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, सोमवार दिन और परिघ योगा का महत्वपूर्ण संयोग बन रहा है। यह मानव जाति के लिए कल्याणकारी माना जाता है। पंचांग के जानकारों के अनुसार, ऐसा योग करीब 84 वर्ष बाद बना है। शास्त्रों के अनुसार, श्रावण शुक्ल पंचमी अर्थात नागपंचमी को नाग देवता की पूजा का विशेष महत्व है।
ज्योतिषाचार्य पं. विवेक उपाध्याय ने चमत्कार चिंतामणि ग्रंथ का हवाला देते हुए बताया कि षष्ठी युक्त पंचमी पूजन करना चाहिए। वजह यह इसी से नागगण प्रसन्न होते हैं। इस वर्ष 24 जुलाई दिन मंगलवार को पंचमी सूर्योदय काल से एक मुहूर्त अर्थात 48 मिनट भी नहीं प्राप्त हो रही है। इस कारण मुहूर्त के अभाव के कारण 23 जुलाई दिन सोमवार को चतुर्थी युक्त पंचमी में नाग पूजन शुभ सूचक होगा।
मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार प्रत्येक शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजन करने का विधान प्राप्त है क्याेंकि पंचमी तिथि का स्वामी शेषनाग को ही माना गया है। इस दिन नौ नागों अनंत, वासुकी, शेषनाग, पद्म, कंबल, कर्कोटक, शंखपाल, कालाख्य तक्षक और महानाग पिंगल की विशेष पूजा की जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आचार्य पराशर ने बृहत होराशास्त्र में सर्प शाप, सर्प दोष का विषद वर्णन किया है। इस सर्प शाप से जनित व्यक्ति को विवाह, संतान और विकास के क्रम में काफी अवरोध होता है। इसके निवारण के लिए आचार्य ने प्रत्येक शुक्ल की पंचमी के साथ-साथ नागपंचमी को विशेष विधि से पूजन करने की बात कही है।
नाग देवता को ऐसे करें प्रसन्न
इस दिन मंडप द्वार के दोनों तरफ गाय के गोबर से सांप की आकृति बनाकर, स्वर्ण, रजत, लकड़ी के ऊपर, भोजपत्र के ऊपर अनार, बेल, चंपा इत्यादि की कलम से सर्प की आकृति बनाकर ओम सर्व नागेभ्यो नम: से आह्वान करें। घी, जल, दूध आदि से तर्पण कर फूल-माला, दुर्वा, रोली, चंदन, धूप-दीप इत्यादि से ओम कुं कुलाय हूं फट् विष शोधक मंत्र से विधि पूर्वक पूजन करें। भोग वश गेहूं, दूध, धान का लावा का भोग लगाकर अनंतादि नव नागों को प्रसन्न कर सकते हैं। पुराणों में ऐसी मान्यता प्राप्त है कि इस दिन नागों का पूजन करने से पूजनकर्ता के सात कुलों तक सर्प का भय नहीं होता। संतानहीन एवं कुंवारी कन्याओं को नाग पंचमी के दिन स्वर्ण वा रजत की नाग प्रतिमा स्वरुप नागों का पूजन करें। साथ ही नांदी श्राद्ध से पितरों को प्रसन्न कर नागलोक के सभी नागों से प्रार्थना करें। तदुपरांत नदी या समुद्र में पूजन की सामग्री को प्रवाहित करें।
गांवाें में अब नहीं दिखाई दे रहे अखाड़े और चिक्का के मैदान
रुद्रपुर। नाग पंचमी लोक परंपरा और संस्कृति से जुड़ा हिंदुआें का बड़ा त्योहार माना जाता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर अब मॉर्डन कल्चर पूरी तरह हावी दिख रहा है।
इससे लोक परंपराएं मिटने लगी हैं। नाग पंचमी पर गांवाें में चिक्का, कबड्डी और कुश्ती जैसे देशी खेल अब गुम होने लगे हैं। रुद्रपुर नगर में नाग पंचमी के अवसर पर हर साल देश के कोने-कोने से पहलवान दंगल में जोर आजमाइश के लिए आते थे। नगर के सतासी मैदान पर आयोजित हुए दंगलों में देश के मशहूर पहलवान चदंगीराम, ब्रह्मदेव मिश्र, भारत भीम जर्नादन सिंह, रामनरायन मिश्र सहित पंजाब प्रांत के कई पहलवान अपना दमखम दिखा चुके हैं। बाहरी पहलवानाें से रुद्रपुर के चर्चित कुश्तीबाज मिर्जा इबारत वेग, रामचंद पांडेय, रामजस यादव आदि अपनी लोहा मनवा चुके हैं। रुद्रपुर क्षेत्र के गांवाें में देशी खेलाें की प्रतिस्पर्धा इस कदर थी कि पूरे साल नाग पंचमी पर कुश्ती करने के लिए तैयारी चलती थी। कबड्डी और चिक्का में जीत दर्ज करने के लिए गांव के युवक कई दिनाें तक रियाज करते थे। न्याय पंचायत स्तर से तहसील स्तर तक दंगलाें का आयोजन हुआ करता था।
शाम को नदियों के घाट पर कठपुतली बहाने के दौरान मेले में लोगाें की भारी भीड़ लगा करता था। सत्यनरायण पांडेय कहते हैं कि आधुनिकता की चकाचौंध में युवा वर्ग इतना व्यस्त हो गया है कि वह लाभकारी लोकाचार और परंपराओं को भूलता जा रहा है। गांवाें की माटी से खेल गायब हो चुके हैं। अब युवा व्यायामशाला में रियाज बनाने में लगे हुए हैं।

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