‘अइले सवनवां लागे सुहावन, बनवां में नाचे मोर’

Deoria Updated Sat, 07 Jul 2012 12:00 PM IST
रुद्रपुर। सावन की पहली फुहार के साथ रुद्रपुर में लोक संस्कृति परवान चढ़ने लगी है। मिट रही लोक संस्कृतियों को रुद्रपुर के लोग आज भी संजो कर रखे हैं। यहां की चर्चित कीर्तन मंडली ने बरसात शुरू होते ही कजरी की धुन छेड़ दी है।
सावन का महीना शुरू होते पुरुष और महिलाएं दोनों कजरी गाते हैं। महिलाएं झूले पर कजरी गाती हैं तो पुरुष भजन कीर्तन के माध्यम से कजरी टेरते हैं। कजरी के माध्यम से न केवल प्रकृति का चित्रण किया जाता है बल्कि गायन की इस लोक विधा से ईश्वर की वंदना भी की जाती है। भजनों और लोक गायकी के लिए मशहूर कीर्तन मंडली रोज शाम छह बजे रात्रि 10 बजे तक दुग्धेश्वर नाथ मंदिर पर कजरी गा रही है। मंडली के गायक मुन्ना चौबे ने कहा कि कजरी सावन की सबसे सुख देने वाली गीत है। इस गीत के माध्यम से देवी देवताओं की अराधना की जाती है। अइले सवनवा लागे सुहावन वनवा में नाचे मोर, को ढोल और झाल से संगीत देकर गायकों ने सावन की पहली फुहार का जोरदार स्वागत किया। सखी हो श्याम सुंदर ना आइलें बितल जाला सवनवां न को आवाज देकर भक्तों ने भगवान कृष्ण की अराधना की। सखी हो अइल सावन मनभावन, उड़न लागे चुनरिया न और सईया किन द पैजनियां, सावन दिनवा न मन मोह ले रहा है। कजरी गायक व्यास पांडेय, मुन्ना चौबे, दलीप पांडेय, जयराम आदि ने बताया की पूरे सावन भर वह लोग शिव मंदिर और भक्तों के घर घूम कर कजरी गाते रहते हैं।

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