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जेल की यातना याद आते ही कांप जाता है रूह

Updated Mon, 05 Jun 2017 10:52 PM IST
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देवरिया। देश में 25 जून 1975 की आधी रात इमरजेंसी लागू हुई। लोकतंत्र की मांग कर रहे युवाओं को पकड़कर जेल में डाला जा रहा था। कुछ भागकर इधर-उधर छिप गए थे। हालांकि बाद में उनकी भी गिरफ्तारी हो गई। आंदोलन से जुड़ी यादें साझा करते हुए लोकतंत्र रक्षक सेनानियों ने कहा कि उस समय के लोग जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार कर चुके थे। सभी दलों के लोग उनके साथ हो लिए थे।
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जेल में तन्हाई में रखा गया
न्यू कॉलोनी निवासी पूर्व विधायक और लोकतंत्र रक्षक सेनानी वीरेंद्र चतुर्वेदी बताते हैं कि आपातकाल के दौरान उन्हें कोतवाली चौराहे से गिरफ्तार कर सीधे जेल में डाल दिया गया। भय के माहौल में पता नहीं लगता था कि कब क्या हो जाएगा। जेल में पुराने साथी मिले। सभी भविष्य के प्रति चिंतित थे। लगता ही नहीं था कि लोकतंत्र फिर से जीवित हो पाएगा। लंबे जेल जीवन की कल्पना कर दिनचर्या सुनिश्चित करने लगे। सूत्रों के माध्यम से सूचना बाहर भेजवाते थे। न्याय पालिका ने दृढ़ता का परिचय दिया तो लगा कि लोकतंत्र जीवित होगा। छह महीने तक जेल में रहे। इस दौरान उनको तन्हाई बैरक में रखा गया। वहां अपने हाथ से खाना बनाना पड़ता था। जेल में ही राजनीतिक प्रशिक्षण होता था। विभिन्न दलों के लोग जेल में एक राय हुए। सभी ने जेपी का नेतृत्व स्वीकार किया। मजबूत विपक्ष की नींव पड़ी। वे कहते हैं कि उस समय बंग्लादेश के प्रधानमंत्री मुजीबुर्रहमान की राष्ट्रपति भवन में हत्या हो गई। हम दहशत में थे, लेकिन संकट के बादल छंट गए।

फर्जी मुकदमों में भेजा गया जेल
भीखमपुर रोड निवासी लोकतंत्र रक्षक सेनानी सुभाष चंद्र उपाध्याय बताते हैं कि 25 जून 1975 को उनकी तिलक थी। आधी रात को इमरजेंसी लागू हो गई। उनको घर से भागना पड़ा। फरारी के दौरान ही उनकी शादी हुई और फिर वे भागकर पटना चले गए। वहां जेपी आंदोलन से जुड़े युवा सुनील सिंह से मुलाकात हुई। उन्होंने बहुत मदद की। रात को पोस्टर लिखकर चिपकाया जाता था। सुनील की गिरफ्तारी के बाद वे देवरिया आए। सदर रेलवे स्टेशन से ही उनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कहते हैं कि जयप्रकाश के नेतृत्व में संपूर्ण भारत के नौजवान अत्याचार, बेरोजगारी, तानाशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। विद्यार्थी जीवन से ही राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा बनते थे। आपातकाल के दौरान छात्र नेताओं और राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए। मौलिक अधिकार समाप्त कर दिए गए। प्रेस पर पाबंदी लगा दी गई और न्याय पालिका में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ गया था। जेल में रहने के दौरान तमाम लोगों के माता-पिता, भाई और सगे-संबंधी दिवंगत हो गए। वे उनका अंतिम दर्शन नहीं कर पाए।
बैरकों पर रहता था कड़ा पहरा
सिंधी मिल कॉलोनी के प्रेमनारायण श्रीवास्तव कहते हैं कि जेल में उन लोगों को यातना सहनी पड़ती थी। जेल में एक तरह से भय का वातावरण बनाया गया था। जब कोई मिलने जाता था तो उससे पूछताछ की जाती थी। मिलकर बाहर आता था तो एलआईयू के लोग उनसे तमाम सवाल करते थे। तत्पश्चात उनके घर के एकाध लोगों को जेल में निरुद्ध कर देते थे। जिस बैरक में बंद थे, वहां कड़ा पहरा होता था। लगता था कि वे लोग बड़े अपराधी हैं। घर से आने वाला सामान भी मुश्किल से जेल में उन तक पहुंच पाता था। 13 जुलाई 1975 को कचहरी में जनांदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई थी। वे बताते हैं कि जेल में मनोरंजन के साधन भी थे। जैसे-कबड्डी और वॉलीबाल खेल लेते थे। जेल में खेती करके समय बिताया जाता था। पूर्व विधायक मंगल उपाध्याय और पूर्व सांसद रामधारी शास्त्री को तन्हाई बैरक में रखा गया था। उनके पैरों में बेड़ियां डाली गई थीं। न्यायालय में पेशी के दौरान एक दृश्य बन जाता था। लोग जानकारी लेने के लिए उत्सुक होते थे। पूर्व विधायक वीरेंद्र चतुर्वेदी भी तन्हाई बैरक में रखे गए थे।

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