वैज्ञानिकों ने वन में घूमकर देखी जड़ी-बूटी

Chitrakoot Updated Thu, 06 Sep 2012 12:00 PM IST
चित्रकूट। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में औषधीय खेती पर चल रही राष्ट्रीय कार्यशाला मे आए देशभर के वैज्ञानिकों ने अनुसुइया वन क्षेत्र में घूमकर जड़ी-बूटियों का जायजा लिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इन दुर्लभ पौधों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाई जाए तो रोजगार सृजन के साथ-साथ लोगों की चिकित्सा में भी लाभ मिलेगा। विवि में देश भर के औषधीय जानकारों की पांच दिवसीय कार्यशाला चल रही है। इलाके में पादप औषधियों की उपलब्धता कैसी है, इसे देखने वैज्ञानिक जंगल में भी गए। वैज्ञानिकों ने माना कि इलाके में ऐसी तमाम औषधियां हैं, जिनसे आम आदमी को फायदा हो सकता है। इन लोगों ने राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाकर इनके संरक्षण की जरूरत बताई। इसके पूर्व तकनीकी सत्र की अध्यक्षता सागर से आए वैज्ञानिक डा. टीआर साहू ने की। उन्होंने वैज्ञानिकों के सामने अपने शोधपत्र ‘टेक्सोनोमिक एप्रोचेज आफ कल्टीवेशन आफ मेडिशनल प्लांट्स’ को रखा। उन्होंने बताया कि इसके माध्यम से उन्होंने भारत में जैव विविधता परिदृश्य का रेखांकन किया है। भारत विश्व में मेगा बायोडायवर्सिटी में उच्च स्थान पर है। उन्होंने जैव विविधता खत्म होने के कारणों पर भी चर्चा की और कहा कि इसका प्रमुख कारण मानव और प्रकृति की भूमिका है। अरुण कुकरेजा लखनऊ ने औषधीय पौधों पर चर्चा की और विभिन्न असाध्य रोगों पर इन्हें कारगर बताया। उन्होंने कहा कि किसानों को इनको कम दामों में उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। उदयपुर (राजस्थान) से आए वैज्ञानिक डा. एसएस केटवा ने रेगिस्तानी इलाके में उगने वाली औषधियों की जानकारी दी। साथ ही राजस्थान के आदिवासियों के रहन-सहन और औषधीय पौधों की रक्षा में उनके योगदान को बताया। उन्होंने इस बात की भी चर्चा की कि वहां बिना किसी सरकारी मदद के वे लोग आसपास की वनस्पतियों और जीवों की रक्षा करते हैं। पुणे (महाराष्ट्र) के वैज्ञानिक डा. केबी बिल्लौरे ने रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ औषधि को भी जीवन के लिए जरूरी बताया। साथ ही कई औषधियों की पहचान भी बताई। इस मौके पर कुलपति प्रो. केबी पांडे भी मौजूद रहे।

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