निकाय चुनाव : भाजपा की राह में अपने बने रोड़े

Chitrakoot Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
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चित्रकूट। निकाय चुनावों में अच्छे प्रदर्शन की संभावनाएं टटोल रही भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने में सब कुछ ठीक नहीं है। अंदरखाने की मानें तो कोर कमेटी से भेजे गए नामों के पैनल के अलावा भी एक और नाम लखनऊ में चला, इस पर उच्च पदाधिकारियों की सहमति भी बनी पर बाद में जिला कोर कमेटी के इस पर किसी भी कीमत में राजी न होने पर बात नहीं बनी और टिकट उमा गुप्ता के हाथ लग गया। हालांकि कुछ बात बिगड़ी जरूर, जिसके बाद राजेश करवरिया बागी हो गए।
विधानसभा चुनाव की तर्ज पर भाजपा में निकाय चुनाव के लिए टिकट का घमासान अंत तक हुआ। तीन नाम पैनल से भेजे गए, इनमें जगदीश गुप्ता की पत्नी उमा गुप्ता, राजेश करवरिया की पत्नी नीलम और सीमा निगम का नाम था। पर लखनऊ में एक और नाम ने तेजी पकड़ ली। यह था महिला मोर्चा की अंजू वर्मा का। अंजू इस बात को मानती भी हैं कि वह लखनऊ गई थीं और उन्होंने जगदीश गुप्ता के खिलाफ (बसपा में रहने के) कुछ प्रमाण भी आलाकमान को सौंपे थे। उन्होंने माना कि उनके नाम को सहमति भी मिल गई थी। मजे की बात यह कि अंजू के नाम की सहमति में जिले के कुछ वरिष्ठ लोग भी थे और बाद में इन लोगों ने इससे कन्नी काट ली थी। सूत्र बताते हैं कि अंजू के नाम पर पार्टी के संगठन मंत्री राकेश जैन की हरी झंडी भी थी। यह शायद नौ जून का मामला है और दस जून को सुबह-सुबह यहां से जिला कोर कमेटी रवाना हुई और अंजू का मामला गड़बड़ा गया। संभावनाएं आंकी गईं कि जगदीश और अंजू के अलावा किसी और नाम पर सहमति बन जाए पर जिला पदाधिकारी नहीं माने। सभी लोग प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी से भी मिले और फिर स्वतंत्र देव सिंह की मध्यस्थता के बाद मामले को रफा दफा करने की कोशिश की गई। जगदीश गुप्ता के नाम पर सहमति दिलाने में पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का विशेष योगदान रहा।अंदरखाने की मानी जाए तो अब भी पार्टी में निकाय चुनाव को लेकर सब कुछ दुरुस्त नहीं है। राजेश करवरिया अपनी पत्नी का नामांकन निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में करा चुके हैं। उधर, उमा गुप्ता के नामांकन के दौरान हेमंत प्रताप सिंह, लवकुश चतुर्वेदी, पंकज अग्रवाल चंद्र प्रकाश खरे, हरीओम करवरिया, आनंद प्रताप सिंह, योगेश जैन, बाबूलाल पटेल जैसे नाम मौजूद नहीं थे। हां, इस बात पर पार्टी जरूर संतोष की सांस ले सकती है कि पंकज अग्रवाल की पत्नी उमा पारिवारिक कारणों से मैदान में नहीं हैं। यह बात पंकज मानते भी हैं। उन्होंने तो दावा किया था कि उनकी पत्नी के नाम पर कोर कमेटी के साथ साथ प्रदेश आलाकमान तक की सहमति थी। हालांकि जिला संयोजक रंजना उपाध्याय से जब पूछा गया कि वह अब राजेश के खिलाफ क्या कार्रवाई करेंगी तो उनका जवाब था, अभी चुनाव की व्यस्तता है, पर इसकी जानकारी आलाकमान को जरूर भेजी जाएगी। हालांकि भाजपा के लिए राजेश की पत्नी का चुनाव लड़ना आगे चलकर सिरदर्द बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। वजह यह कि उनके पिता स्व. गोपालकृष्ण करवरिया लगभग तीस साल तक अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुके हैं और उनकी छवि विकासपुरुष की बनी है।

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