वन्य क्षेत्र : दावे और हकीकत जुदा-जुदा

Chitrakoot Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
पाठा इलाके में घटते जंगलों से पर्यावरण को है खतरा
वन विभाग नहीं मानता जंगल परिक्षेत्र में आई कमी
चित्रकूट। जागरूकता की कमी और जिम्मेदारों की उदासीनता से जिले में वन क्षेत्र संकुचित होते जा रहे हैं। हालांकि वन विभाग और सेंचुरी दावा करता है कि लगभग बीस पचीस साल पहले जो वन्य क्षेत्र था आज भी उतना ही इलाका वनाच्छादित है पर हकीकत इससे जुदा है। खास तौर पर भेदक, गिदुरहा, धारकुंडी आदि विशेष सुरक्षा वाले इलाकों में पेड़ों की घटती संख्या से इतना तो तय है कि कहीं न कहीं पर्यावरण का घाटा तो हो ही रहा है।
एक अनुमान के अनुसार लगभग बीस साल पहले जिले में 72 हजार हेक्टेअर वन क्षेत्र था। वन विभाग के रेंजर (कर्वी क्षेत्र) नरेंद्र सिंह हालांकि कहते हैं कि अभी भी पूरे जिले में इतना ही इलाका वनाच्छादित है। उन्होंने पर्यावरण को बचाने के लिए विभाग की योजनाओं की जानकारी तो दी ही साथ ही यहां के लोगों में वनों को लेकर जागरूकता की कमी को इंगित किया। उन्होंने कहा कि यहां वन प्रदेश इतना है कि लोगों को यह जरूरत ही महसूस नहीं होती कि नए पौधों को रोपा जाए, बचाया जाए। उनके अनुसार, जिले की मिट्टी में जलधारण क्षमता कर होने की वजह से भी नए पौधों को पनपने में दिक्कत आती है। नीचे भी नमी नहीं है और मिट्टी भी कंकरीली है। मिट्टी के कंकरीली होने और आमतौर पर पौधों के वर्षा के पानी पर निर्भर होने की वजह से यहां कुछ विशेष पौधों को ही रोपा जाता है। इनमें से नीम, शीशम, कनकचंपा, चिकवन, अर्रु, सिरस, खैर प्रमुख हैं। खास तौर पर यहां के पौधों के बरसात के भरोसे रहने से भी यहां हर तरह के पौधों का पनप पाना मुश्किल होता है। बताते हैं कि साल भर में बमुश्किल आठ से दस दिन पूरी तरह से रेनी डेज माने जाते हैं और उसी दरम्यान प्लांटेशन किया जाता है। यहां शुष्क पर्णपाती वन हैं, जिनका जनवरी के पास पतझड़ हो जाता है। बताते हैं कि पौधों के न पनपने की कई वजहें हैं, जिनमें सुरक्षा की कमी, अन्ना पशु और इसके अलावा सबसे प्रमुख जागरूकता की कमी है। हर साल गर्मी के मौसम में लगने वाली जंगल में आग भी वन क्षेत्र को तगड़ा नुकसान पहुंचा रही है पर न तो इसकी वजह वन विभाग खोज पाया है और न रोकथाम की तरकीब।


...तो स्वत: पनप जाएं पौधे
रेंजर नरेंद्र सिंह कहते हैं कि जिले में कम से कम 25 हजार हेक्टेअर का वन इलाका ऐसा है, जहां जमीन पर पौधों की जड़ें अभी भी हैं। इस इलाके में अगर आवागमन प्रतिबंधित कर दिया जाए, जानवरों से सुरक्षा कर दी जाए, तो यहां पौधे स्वत: ही पनप जाएंगे।
चेकडैम को गलत नहीं मानते वनाधिकारी
वन विभाग ने पिछले दो साल के अंदर लगभग पचास चेकडैम बनाए हैं। अधिकारी दावा करते हैं कि ये पर्यावरण बचाने के अच्छे साधन हैं और जहां भी विभाग ने चेकडैम बनाए हैं वे उम्मीदों पर खरा उतरे हैं। नरेंद्र सिंह ने बताया कि पहरा में बनाए चेकडैम से तो किसानों ने इस बार दो फसलें लीं, पहले तिल्ली की और फिर गेहूं की। बताया कि बुंदेलखंड विशेष पैकेज के तहत मनरेगा और दो अन्य योजनाओं के तहत लगभग 14 करोड़ रुपए चेकडैम के लिए आए। उन्होंने हाल ही में लघु सिंचाई के बनाए चेकडैमों पर किसानों के आक्रोश पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।
खरी नहीं उतरी उम्मीदों पर सेंचुरी
केंद्र सरकार जहां वन्य जीव जंतु, औषधि और अन्य कीमती वन वस्तुओं को संरक्षित करने के लिए नेशनल पार्क की स्थापना करती है वहीं राज्य सरकार सेंचुरी की। मानिकपुर में 20 जनवरी 1977 में 26,332.32 हेक्टेअर वन्य क्षेत्र को संरक्षित करने के उद्देश्य से रानीपुर वन्य जीव विहार (सेंचुरी) की स्थापना की गई। मानिकपुर और मारकुंडी के वन्य क्षेत्र के लिए यह स्वतंत्र रूप से सन् 98 में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आया। पर रिकार्ड के इतर अगर हकीकत पर जाया जाए तो कभी चीता, चिंकारा, तेंदुआ आदि जानवरों से भरे रहने वाले इस इलाके में अब ये नजर नहीं आते। जानकारी के मुताबिक, यहां के डीएफओ तो मिर्जापुर में बैठते हैं पर यहां की देखरेख का जिम्मा एसडीओ/ वन्य जीव प्रतिपालक के अलावा, दो रेंज आफीसर, लगभग दस गार्ड, छह वन दारोगा और लगभग दस वाचरों के बाद भी सेंचुरी की उपयोगिता लोगों को नजर नहीं आती। बल्कि यूं कहा जाए कि सेंचुरी को लेकर मानिकपुर के लोगों में ज्यादा आक्रोश है तो गलत नहीं होगा। वन क्षेत्राधिकारी सेंचुरी वाईपीएस यादव ने बताया कि सेंचुरी में 2011 में हुई गणना के अनुसार 15 काले हिरन, 164 सांभर, 618 सुअर, 366 नीलगाय, 64 भालू, 977 बंदर और 830 लंगूर हैं। चीता, तेंदुआ, शेर जैसे मांसाहारी जीव लगभग विलुप्त हैं। जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो वह कुछ नहीं बता सके।

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