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मऊ आकर भावुक हो गए अस्पताल के पहले डाक्टर साब

Chitrakoot Updated Sun, 10 Feb 2013 05:31 AM IST
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मऊ (चित्रकूट)। अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि की यादें कभी भूलती नहीं। अगर यह सच न होता तो दिल्ली में रह रहे डा. अमर सिंह टक्कर कसबा आकर भावुक न हुए होते, रुककर पुराने साथियों को याद न किया होता। 93 वर्षीय रिटायर्ड फौजी डाक्टर अमर सिंह शुक्रवार को सपरिवार कसबा आए थे। वह यहां एक रात रुके साथियों से मिलकर यादें ताजा करते हुए कई बार रोए।
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पाकिस्तान के लायलपुर (अब फैसलाबाद) में लगभग 93 साल पहले पैदा हुए डा. अमर सिंह टक्कर उर्फ डा. कैप्टन सन् 1950 में मऊ में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना होने के बाद पहले चिकित्सक के रूप में आए थे। सन् 1944 से 48 तक सेना की डोगरा रेजीमेंट में मेडिकल अफसर के रूप में बर्मा में तैनात रहे डा. टक्कर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कश्मीर में देशसेवा की थी। उनको देशसेवा के लिए वीरता पुरस्कार भी मिला। इसके बाद पद से सेवानिवृत्ति ली और सामाजिक जीवन में कदम रखा तो पहली पोस्टिंग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मिली। इसके बाद मथुरा, सीतापुर, नैनीताल में सेवाएं देने के बाद सन 95 में सेवानिवृत्ति ली और दिल्ली में निवास बना लिया। खजुराहो से अपने परिवार पत्नी गुरबचन कौर (90), बड़ी बेटी राजपाल (73), छोटी अजीत कौर (61) और पुत्र कृपाल सिंह (58) के साथ लौटते समय वह शुक्रवार की शाम मऊ पहुंचे तो उनके सामने पुरानी यादें चलचित्र सी घूम गईं। उन्होंने वहीं कार रुकवाई। पूछते पूछते पूर्व ब्लाक प्रमुख नवल किशोर मिश्रा के घर पहुंचे। पूरी रात मिश्राजी के यहां पुरानी बातें कीं। उनके मित्र भैरो प्रसाद रस्तोगी भी वहां पहुंच गए थे। उन्होंने बताया कि पहले अस्पताल के पास एक मंदिर, एक तालाब हुआ करता था, यही यहां की पहचान थी। दो-चार महुवा के पेड़ थे। साइकिल से गांवों में दवा करने जाते थे। इतनी मशीनरी तो थी नहीं, आला और नाड़ी देखकर इलाज किया जाता था और मरीज चंगा होता था। बस से बांदा से दवाइयां आती थीं। बातें करते करते कई बार उनकी, उनके परिवार की और लोगों की आंखें नम हुईं। उन्होंने बताया कि दिल्ली में वह टिटनेस का इलाज करने के साथ ही फिजीसियन के रूप में मरीजों को चिकित्सीय राय देते हैं। सुबह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, बाजार, बस स्टैंड आदि घूमने के बाद वह कार से दिल्ली चले गए।


इनसेट -------------------
अपने साथ अस्पताल की ईंट ले गए डाक्टर साहब
शुक्रवार की शाम को जब डा. टक्कर खजुराहो घूम फिरकर लौटते समय मऊ पहुंचे तो वहां का नजारा बदला बदला था। अब समस्या पहचान की थी। जब पूछते-पूछते सुबह अस्पताल पहुंचे तो वहां उस कमरे में भी गए, जहां उनकी छोटी पुत्री अजीत कौर का जन्म हुआ था। उन्होंने वहां की रज को माथे से लगाया तो लोगों की आंखें भर आईं। बाद में वहां उखड़ी पड़ी एक ईंट को संजोकर वह अपने साथ लेते गए। डा. साहब की पुत्री राजपाल इस समय किरन बेदी के एनजीओ में हैं तो अजीत कौर खुद का एनजीओ चलाती हैं। कृपाल सिंह की केमिस्ट की दुकान है।

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