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मछली ही नहीं तालाबों में मोती भी पालेंगे ग्रामीण

Chitrakoot Updated Tue, 29 Jan 2013 05:30 AM IST
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चित्रकूट। दीनदयाल शोध संस्थान के तुलसी कृषि विज्ञान केंद्र गनीवां में मोती पालन इकाई का शुभारंभ किया गया। डा. एस अयप्पन सचिव कृषि अनुसंधान, शिक्षा विभाग एवं महानिदेशक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने इसका उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि किसान तालाबों में मछली पालन के अलावा मोती पालन भी कर सकेंगे।
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डा. अयप्पन ने कहा कि किसान तालाबों में मछली तो पालते आ ही रहे हैं पर अब वे इसमें सीपों से मोती भी निकाल सकेंगे। साधारण विधि से मोती निकालने की यह अनूठी विधि यहां जानकारों द्वारा सिखाई जाएगी। उन्होंने मोती पालन सिखाने आए वैज्ञानिक अशोक मनवानी से नानाजी देशमुख और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सदृश मोती उत्पादन की बात कही। इससे किसान प्रति हेक्टेअर पंद्रह से बीस हजार रुपए अतिरिक्त पैदा कर सकेगा। उन्होंने कहा कि अगर किसान चाहे तो उसे देश के किसी भी कोने में ले जाकर प्रशिक्षण दिया जाएगा। किसानों को समूह बनाकर खेती करने और अपने काम में ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र को रिंग के रूप में बताते हुए कहा कि जो भी समस्याएं हैं, वे इस केंद्र में हल हो जाएंगी। उन्होंने किसानों की समस्याओं को 15 दिन में हल किए जाने की आवश्यकता भी बताई। इस मौके पर उन्होंने बालापुर खालसा में डीआरआई के कामों को भी देखा। साथ ही खेतों को भी देखा। इस मौके पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्षेत्रीय परियोजना निदेशक डा. एके सिंह ने भी किसानों को संबोधित किया। प्रधान वैज्ञानिक डा. लाखन सिंह, डा. अतर सिंह, केंद्र के कार्यक्रम समन्वयक डा. छोटे सिंह के अलावा किसान मौजूद रहे।
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बड़ा सरल है मोती उगाना- अशोक
गनीवां में यह अपनी तरह की अलग और एकमात्र इकाई है, जिसमें किसानों को मोती पालन सिखाकर उसका लाभ उनको दिलाने की कोशिश की जाएगी। यह बात मुंबई से आए मोती विशेषज्ञ और वैज्ञानिक अशोक मनवानी ने कही। उन्होंने बताया कि मोती उत्पादन दो तरह का होता है, जिसके बारे में आमतौर पर किसान नहीं जानते। समुद्र में बड़ी सीपियों में बड़ी मोती निकलती हैं, जबकि तालाबों और नदियों में पाए जाने वाले सीपियों में छोटी मोतियां निकलती हैं। उन्होंने बताया कि आमतौर पर हर तालाब में सीप होती है। इसमें एक विशेष प्रकार की मशीन से एक सीमित आपरेशन कर दाना डाला जाता है और अंदर का कीड़ा मोती बन जाता है। बताया कि इसमें एक सीप में बीस रुपए का खर्च आता है और मोती सौ से ढाई सौ रुपए तक में बिक जाता है। उन्होंने बताया कि कभी कभी एक मोती की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है। पर इसका निर्णय रंग, रूप और आकार के अनुसार किया जाता है। उनकी पत्नी कुलंजन दुबे मनवानी भी मोती विशेषज्ञ हैं और गनीवां में दोनों को इस प्रोजेक्ट के लिए जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने बताया कि भुवनेश्वर, कोचीन, केरल आदि जगहों पर इस विधि से व्यावसायिक रूप से तो मोती उत्पादन किया जा रहा है पर किसानों के लिए यह पहला प्रयास है। उन्होंने बताया कि एक मोती बनने में एक साल लगता है। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि बुंदेलखंड में अभी ज्यादा प्रदूषण नहीं है और इसलिए यहां सीप बहुत हैं। उन्होंने बताया कि मोती को किसी भी आकार के रूप में बनाया जा सकता है। इसके लिए पहले जापान से मशीन आती थी पर अब उन्होंने इसका प्रतिरूप लकड़ी में बना लिया है, जिसकी कीमत सौ रुपए तक पड़ती है।
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