तुलसी जन्मस्थली विवाद से दुखीः जिलाधिकारी को सौंपे साक्ष्य और सीएम को भेजा ज्ञापन

Chitrakoot Updated Tue, 18 Dec 2012 05:30 AM IST
चित्रकूट। गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म स्थली को प्रदेश सरकार द्वारा गोंडा के सूकरक्षेत्र में बताए जाने और यहां के लिए 20 लाख की धनराशि दिए जाने से नाराज राजापुर के दो दर्जन लोगों ने जिलाधिकारी डा. बलकार सिंह से भेंट की। इन लोगों ने जिलाधिकारी को चित्रकूट के राजापुर में तुलसीदास के जन्में होने के कई साक्ष्य पेश किए।
तुलसी स्मारक समिति राजापुर के संयुक्त सचिव शिवपूजन गुप्ता ने कहा कि प्रदेश सरकार ने गोंडा में तुलसी दास के जन्म का स्थान मान कर इसे विवादित बना दिया है। इससे यहां के लोगों में नाराजगी भी है और लोगों को मानसिक आघात भी पहुंचा है। विवेक अग्रवाल ने जन्म स्थली के विवाद पर कहा कि सरकार को कुछ लोग गलत जानकारी देकर पैसा ऐंठने की कोशिश कर रहे हैं उनकी यह मंशा कभी पूरी नहीं होने देंगे। राजापुर ही तुलसी की जन्मभूमि है और इसके लिए चाहे जितनी भी लड़ाई लड़नी पड़े लड़ी जाएगी। तुलसी के जन्म स्थान को विवादित न बनाए जाने और राजापुर को यथावत जन्म स्थली घोषित किए जाने की मांग को लेकर तुलसीदास के 11वीं पीढ़ी वंशज के साथ राजापुर तुलसी स्मारक के सदस्यों ने मुख्यमंत्री के नाम जिलाधिकारी को तमाम साक्ष्यों के साथ ज्ञापन सौंपा। जिलाधिकारी बलकार सिंह ने आश्वासन दिया कि उन्हें दिए गए जन्म स्थली के सभी साक्ष्य प्रमुखता से मुख्यमंत्री को भेजे जाएंगे। जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपे जाने के दौरान उप्र उद्योग व्यापार मण्डल अध्यक्ष सुभाष चंद्र अग्रवाल, पत्रकार विवेक अग्रवाल, पंकज अग्रवाल, बालकृष्ण शर्मा, लक्ष्मी प्रसाद वर्मा, सन्तोष कुमार, रामगणेश पांडे, अरविंद कुमार तिवारी, सूर्यप्रकाश त्रिपाठी धीरेद्र कुमार आदि मौजूद रहे।

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ये दिए प्रमाण
राजापुर के लोगों ने जिलाधिकारी को इस संबंध में तमाम महत्वपूर्ण बातें बताईं। दावा किया कि चित्रकूट के राजापुर में गोस्वामी तुलसी दास के जन्मे होने के कई प्रमाण हैं। सबसे बड़ा साक्ष्य गीता प्रेस से प्रकाशित ग्रन्थ रामचरित मानस में भी है। बादशाह औरंगजेब ने तुलसी दास के यहां जन्मे होने का हाटबाट घाट माफी का पत्र भी दिया था जो आज भी यहां मौजूद है। खुद को तुलसी दास के 11वीं पीढ़ी के वंशज बताने वाले रामाश्रय दास त्रिपाठी ने बताया कि महाराजा हिंदुपति ओरछा नरेश ने भी यहां तुलसी दास की जन्मस्थली होने से प्रेरित होकर हाटबाट घाट का माफी नामा वसूल करने का पट्टा दिया था। 1812 ई. में ओरछा नरेश के अधिकारियों ने इस पर कब्जा कर लिया। दोबारा ओरछा नरेश ने 1813 में हाटबाट घाट की माफी वसूलने के अधिकार को तुलसी दास के शिष्य वंशज के लोगों को दे दिया। उन्होंने बताया कि इस माफीनामा के दुर्लभ साक्ष्य आज भी यहां सुरक्षित रखे हैं। शिष्य वंशज ने बताया कि 1846 में तत्कालीन सरकार के सेकेट्री ने इलाहाबाद कमिश्नर को माफी नामा जारी रखने के लिए पत्र भी लिखा था। औरंगजेब के कई पत्र, ओरछा नरेश का हिंदूपत्र, ब्रिटिश सरकार के 1845 के पत्र और तुलसीदास की हाटबाट माफी की रसीदें उनके पास आज भी सुरक्षित रखी हैं। उन्होंने कहा कि बेनीमाधव दास ने अपने मूल गोसाई चरित में भी दोहा उद्यत किया है- संवत सोलह सौ चौबीस बसि कालिंदी के तीर/ श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धर्यो शरीर। बेनी माधव तुलसीदास के प्रिय शिष्य थे, जो गोंडा में पसका (सूकर क्षेत्र) के मूल निवासी थे। कालिंदी तीर राजापुर में ही है।

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जन्मभूमि विवाद : बढ़ता जा रहा है लोगों में आक्रोश
सीतापुर (चित्रकूट)। महाकवि तुलसीदास की जन्मभूमि के विवाद के फिर से उभरने से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। राजापुर को ही उनकी वास्तविक जन्मस्थली बताने के लिए लोगों ने तर्क देने शुरू कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि साक्ष्य और अभिलेखों में भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि राजापुर ही में तुलसीदास का जन्म हुआ था।
बांदा के प्रख्यात विद्वान डा. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने दावा किया कि उनके पास तो दुर्लभ राम चरित मानस की मूल प्रति सुरक्षित है, जिसमें खुद तुलसीदास ने कहा है कि उन्होंने शैशवकाल में सूकरक्षेत्र में रामकथा गुरु से सुनी थी, न कि उनका वहां जन्म हुआ- मैं तुलि निज गुरु सन सुनी, कथा सो सूकर खेत/ समझै नहीं तस बालपन, तब अति रहो अचेत। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट है कि इस (सूकर खेत) में उनका जन्म नहीं हुआ था। अन्य लोगों ने भी राजापुर को तुलसीदास की जन्मस्थली बताने के तर्क दिए। पंकज अग्रवाल ने कहा कि गजेटियर कर्वी में भी उल्लेख है कि औरंगजेब, ब्रिटिश हुक्मरानों ने भी संत तुलसी की जन्मस्थली राजापुर मानी थी और यहां तमाम सुविधाएं दी थीं। उस समय पर विभिन्न राजनेताओं ने भी यहां आकर इस स्थान के महत्व को माना। चित्रकूट संघर्ष समिति के अध्यक्ष देवीदयाल यादव ने तो इस पूरे घटनाक्रम से आक्रोशित होकर सीएम को फैक्स भेजा है। उन्होंने कहा कि वह अंतिम सांस तक इस क्षेत्र को तुलसीदास की जन्मस्थली की मान्यता देने के लिए संघर्ष करेंगे और जल्द ही लोगों को इसके लिए जागरूक करेंगे। उनका यहां तक कहना था कि सोरों (एटा) को तुलसीदास की जन्मस्थली के रूप में मान्यता देने वालों का विवेक शून्य हो चुका है।



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