...और बिखेरीं लोक विधा की छटाएं

Chitrakoot Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
लोकलय समारोह में बुंदेलखंड के लोक कलाकारों ने लोगों को मोहा
चित्रकूट। भारत जननी परिसर रानीपुर भट्ट में शनिवार अपराह्न से शुरू दो दिवसीय लोकलय समारोह में लोक कलाओं की कई प्रस्तुतियां देखने को मिलीं। उद्घाटन सत्र में लोक विधाओं की विभिन्न छटाएं नजर आईं।
कार्यक्रम के शुभारंभ में अतिथियों के आगे बधाई गा रही युवतियां चल रही थीं तो मंच पर स्वागत द्वार में कलश लिए दो महिलाएं अगवानी को तैयार थीं। मंच में आम की पत्तियां, गुड़हल के फूल के साथ कपड़े और रुई से बने घोड़े हाथी, पहाड़ से निकली हुई गुफा, जिसमें से कलाकार आ जा रहे थे। बूटी, प्रभा मिश्रा, मीताक्षरा, विद्योत्तमा शुक्ला ने बधाई गाई- धीरज धरौ प्राण आगे रामजी मिलिहैं। आम कार्यक्रमों की तरह न तो कोई मुख्य अतिथि था न कोई अध्यक्ष, सभी समान थे। ललितपुर से आए संतोष परिहार और उनकी टीम ने सो जा, सो जा बारे बीर, बीर की बलैया ले गई जमुना के तीर लोरी से कार्यक्रम लय में आया। इसके बाद बड़ोखर खुर्द बांदा के पर्वत प्रसाद, चंद्रपाल और साथियों की जातीय विधा पर आधारित कुम्भरई में लोकवाद्य किंगिहरी की संगत जोरदार थी। प्रस्तुति की शुरुआत देवी आराधना से की- सरस्वती स्वर दीजिए, मां शारदा दीजे ज्ञान, बजरंगी बल दीजिए, करउं तुम्हारा ध्यान। बेलाताल (महोबा) के दस्सी लंबरदार ने तंबूरा गायन की लयदार पारंपरिक प्रस्तुति दी और इसमें नाचे भी- कर ले मन थोड़ा सा गुजारा, काहे की ईंट काहे का गारा/ तन की ईंट सुरत का गारा। डा. राजश्री ने राजस्थानी माड़ की प्रस्तुति दी- केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस। पश्चिमी राजस्थान में मंगनियार जाति के लोगों में प्रचलित इस लोकगीत की पंक्तियां- कागा सब तन खाइयो चुन चुन खइयो मांस/ दो नैना मत खाइयो, जामे पिया मिलन की आस... पर देर तक तालियां बजीं। इनके अलावा दीपू सिंह का आल्हा, नरैनी के कलाकारों की कहरई, जालौन के लोगों की अचरी आदि प्रस्तुतियां हर लिहाज से श्रेष्ठ थीं। कलाकारों का पहनावा, रमतुल्ला, नगाड़ा, इकतारा, तबला आदि वाद्ययंत्रों की संगत सब कुछ लोकरंग में रंगी थी। इसके पूर्व बड़ोखर बुजुर्ग के युवा जादूगर महेंद्र प्रताप सिंह ने जादू से मालाएं बनाकर अतिथियों का माल्यार्पण किया। कार्यक्रम में अष्टांग गायकी के वयोवृद्ध संरक्षणदाता ग्वालियर घराने के डा. प्रभाकर लक्ष्मण गोहदकर को बुंदेलखंड का लोक सम्मान दिया गया। कार्यक्रम आयोजक अखिल भारतीय समाजसेवा न्यास के गोपाल भाई ने बताया कि उन्होंने सन् 2005 में इस समारोह की शुरुआत की तो अगली बार धनाभाव आदि से इसके आयोजन में व्यवधान आया। पर जब यहां के कलाकारों ने बिना किसी पारिश्रमिक के आने की बात कही और हर हाल में कार्यक्रम करते रहने पर जोर दिया तो यह आयोजन वार्षिक हो गया। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि आधुनिक संचार युग ने लोक परंपराओं से दूर कर दिया है। अवसरों की, मंच की कमी से लोककलाकार उपेक्षित हो गए हैं। उद्घाटन सत्र में प्रख्यात पत्रकार भारत डोगरा, पूर्व विधायक भैरो प्रसाद मिश्र, नेहरू युवा केंद्र के निदेशक चंद्रशेखर प्राण, डा. वीणा श्रीवास्तव, मृदंग वादक अवधेश द्विवेदी, समाजसेवी पंकज अग्रवाल, समाजसेवी आलोक द्विवेदी एडवोकेट आदि ने मौजूद रहकर कलाकारों की हौसलाफजाई की। संचालन लल्लूराम शुक्ल ने किया।

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