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पाठा क्षेत्र में हर तरफ पानी की त्राहि-त्राहि

Kanpur	 Bureauकानपुर ब्यूरो Updated Sun, 19 May 2019 11:24 PM IST
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चित्रकूट। बरगढ़ व मानिकपुर के पाठा इलाके के अधिकांश ग्राम पंचायतों में पानी का घोर संकट है। लोगों को दूरदराज से कड़ी धूप में सिर मे चोहाडों से पानी लाकर गुजारा करना पड़ रहा है। गाँवों में लगे अधिकांश हैंडपम्प शोपीस बने हैं। इसमें कुछ खराब पड़े हैं, तो किसी का जल स्तर नीचे चला गया है। पानी के अलावा कई क्षेत्रों के ग्रामीण परिवार पालने के लिए सुबह से मजदूरी करने निकल जाते हैं और तब घरों की बेटियां बैलगाड़ी अथवा पैदल जाकर पानी लाने को मजबूर हैं।
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कुछ ऐसा ही हाल सकरौंहा, रानीपुर, जारोमाफी व गोपीपुर का भी है। यहां के निवासी रामलाल, जुम्मन, चुन्ना, केवल प्रसाद, संवरिया देवी, गुलबिया, चंपा, सन्नो व चुनिया आदि ने बताया कि पानी के साथ ही उन्हें अपने परिवार के बच्चों का पेट भी भरना होता है। घरों में बेटियों पर पानी व भोजन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यह बेटियां बखूबी अपना दायित्व निभाती हैं। खुद बैलगाडी, साइकिल लेकर गांव के बाहर बने टयूबवेल आदि से पानी लाती हैं। गुड़िया देवी, सविता व पुष्पा ने बताया कि दूर-दूर से पानी का इंतजाम करना पड़ता है, ताकि घर के काम चल सकें।

हैंडपंप पर कागज में लाखों का खर्च
मानिकपुर। मानिकपुर ब्लाक के छेरिहा, रामपुर कल्याणगढ़, टिकरिया, जमुनिहाई, मनगवां गांव के अधिकांश हैंडपम्प खराब पड़े हैं। ग्रामपंचायतों से हर वर्ष लाखों रुपये हैंडपम्प की मरम्मत व सामान खरीदने में व्यय होता है। यह अलग बात है कि सप्लायरों से फर्जी बिल बाउचर बनवा कर कार्य बंदरबाँट कर लिया जाता है। तब भी रिपरिंग के बाद हैंडपंप खराब हो जाते हैं। मनिकपुर कस्बे में भी हैंडपम्पों की हालत बेहद खराब है। छेरिहा गांवके महेंद्र, बब्बू, रामराज, सुनील, देवमुनि आदि ग्रामीणों का कहना है कि अगर गांव में लगे हैंडपंपों को ठीक कर दिया जाए, साथ ही हैण्डपंपों के पाइप बढ़ा दिए जाएं, तो हमारे गांव का जल संकट दूर हो सकता है।

बरदहा बन सकती वरदान
चित्रकूट। पाठा क्षेत्र के जलसंकट का निवारण करने के लिए बरदहा नदी वरदान बन सकती है, लेकिन मंच व अन्य कार्यक्रमों में बड़ी बडी बातें करने वाले मंत्री, नेता, अधिकारी व स्वयंसेवी संस्था के पदाधिकारियों को इसकी चिंता नहीं है। बारिश के दिनों में मानिकपुर के दो दर्जन गांव के बीच में बहने वाली बरदहा नदी में इतना पानी होता है कि कई गांव में बाढ़ आ जाती है। एक माह बाद ही इस नदी का पानी खत्म होना शुरु होता है और इसे बचाया नहीं जाता। कुल्लू डोर, मारकुंडी, जारोमाफी, नागर, निही चिरैया, गिदुरहा, गुरदरी, सकरौंहा चमरौंहा जैसे दस्यु प्रभावित गांव के लोग गम्री में पानी के लिए परेशान होते हैं। जल संरक्षण क्षेत्र के लिए वरदान हो सकता है।

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