घर की मुंडेर पर कौआ बन आए पूर्वज

Chandauli Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
सकलडीहा। शारदीय नवरात्र के 15 दिन पूर्व पड़ने वाले अश्विन माह के पहले दिन से शुरू होने वाले पितृपक्ष की तिथियां पितरों के लिए खास होती हैं। पितृ ऋण से उऋण होने के लिए विविध पूजा पाठ और दान की परंपरा चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि इन पंद्रह दिनों तक पूर्वज विभिन्न रूपों में अपने निवास स्थान पर रहते हैं। इस बार पितृपक्ष एक से 15 अक्तूबर तक पड़ रहा है। इन दिनों में कौआ को भोजन खिलाने की विशेष मान्यता है। सोमवार को सुबह से ही पितरों के नाम से भोजन की थाली निकालने व पानी देने के बाद लोगों ने भोजन ग्रहण किया।
गौरतलब है कि अंग्रेजी माह की भांति हिन्दी महीना भी 12 माह का होता है। इसमें प्रत्येक माह में नये नये आयोजन होते हैं। उसी हिन्दी महीने के आश्विन माह का विशेष महत्व होता है। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन को पितृ पक्ष के रूप से जाना जाता है। इन पंद्रह दिनों तक पितरों के लिए तर्पण व दान की मान्यता है। पितृ पक्ष में कौओं का विशेष महत्व होता है।
पंडित रामनिवास पाठक का मानना है कि पितृ पक्ष में पांच बलि (बलि का अर्थ भोजन से है) जिसमें काग बलि, स्वान बलि, अगिभन बलि, चौक बलि, गौ बलि है, जिसके तहत प्रतिदिन लोगों को सुबह शाम खाने से पहले भोजन बनाकर कौआ, कुत्ता, गाय, अगिभन व रसोई घर के अंदर भोजन को निकाल कर रखना चाहिए। उसके बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने बताया कि पितृ देवता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन इनका नित्य पूजा नहीं हो पाता। इससे पंद्रह दिनों तक विशेष रखा गया है। उनका कहना है कि पितृ पक्ष में तो प्रतिदिन जल तर्पण, अन्नतर्पण का विधान है।



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