नहीं दिख रहे हैं दूसरी हरित क्रांति के लक्षण

Chandauli Updated Tue, 21 Aug 2012 12:00 PM IST
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चकिया। धान के कटोरे में दूसरी हरित क्रांति के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं। एकीकृतनाशी जीव प्रबंधन की थ्योरी अभी ग्रास रूट पर सफल नहीं हुई है, जैव उर्वरकों के प्रयोग को उत्पादन की दृष्टि से जोड़ कर देखने का क्रम जारी है। बीजों के बदलाव की थ्योरी पर भी किसान अमल नहीं कर रहे हैं तथा दलहनी, तिलहनी एवं औद्यानिक फसलों का रकबा अपनी जगह ठहरा हुआ है। वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक भी दूसरी हरित क्रांति को लेकर उतने आश्वस्त नहीं दिख रहे हैं।
अधिक उत्पादन बढ़ाने के लिए सत्तर के दशक से आरंभ हुई हरित क्रांति के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग से मिट्टी की दूसरी परत हाईडिस्क में बदल गई है, जिससे धान के कटोरे में हाईब्रिड तथा रिसर्च बीजों का उपयोग होने के बाद भी उत्पादन में ठहराव दिखाई दे रहा है, जबकि उत्पादन के सापेक्ष आबादी बढ़ने का प्रतिशत साल दर साल बढ़ रहा है।
इस स्थिति से चिंतित भारत सरकार के कृषि मंत्रालय तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कान खड़े हुए हैं तथा वे दूसरी हरित क्रांति की वकालत करने लगे हैं। इसके तहत कई तरह की कार्य योजनाएं भी सामने आई हैं। मसलन वर्षों पुरानी पड़ चुकी परंपरागत खेती को दोबारा प्रयोग में लाने की कवायद आरंभ हो चुकी है, जिसके तहत जैव उर्वरकों, हरी खाद के इस्तेमाल को बढ़ाने तथा धीरे धीरे रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने की नई थ्योरी दूसरी हरित क्रांति में उभर कर आई है। इसके अलावा साल दर साल पानी की घटती मात्रा के चलते अधिक पानी वाले क्षेत्रों में ही धान की खेती करने तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में धान की खेती की जगह खरीफ में वैकल्पिक फसलों की खेती की नई थ्योरी भी सामने आई है, लेकिन किसान जैव उर्वरकों तथा जैव कीट एवं रोग नियंत्रकों का प्रयोग बढ़ाने को तैयार नहीं दिखते हैं।

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