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प्यार का अनूठा बंधन है रक्षाबंधन

Chandauli Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
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चंदौली। रक्षा बंधन दूसरे की रक्षा करने के साथ-साथ आत्म रक्षा करने की प्रेरणा भी देता है। यही कारण है कि इसे विष तोड़क पर्व भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार यम को उसकी बहन इंद्राणी ने रक्षा बांधी थी, जो अब परंपरा बन गई। इसलिए कहा जा सकता है कि राखी सिर्फ हिंदुओं का त्योहार न होकर सभी मजहबों व धर्मो में भाई व बहन के प्यार के अटूट बंधन को निभाने वाला पर्व है।
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सावन के रिमझिम के साथ ही त्योहारों की रंग बिरंगी श्रृंखला शुरू हो जाती है। रक्षाबंधन का पर्व रिश्तों की खूबसूरती को बनाए रखने का बहाना है। हर रिश्ते की एक अपनी पहचान है, लेकिन भाई बहन का प्यार एक दूसरे के मन में खुशी और विश्वास का एहसास कराता है। यह पर्व किसी रेशमी रिश्ते की पवित्रता का प्रतीक है। भाई बहन के हर कष्ट में साथ निभाने का वचन देता है तो बहन भी भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके लंबी उम्र की कामना करती है। जब मध्य कालीन युग राजपूतों एवं मुस्लिमों के बीच युद्ध चल रहा था। रानी कर्मवती चित्तौड़ के राजा की विधवा थी। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी कर्मवती ने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी और रक्षा का वचन लिया। हुमायूं ने भी रानी के द्वारा भेजी गई राखी की लाज रखते हुए उनकी रक्षा कर उन्हे मुंहबोली बहन का दर्जा दिया। इसी तरह युद्ध के दौरान शिशुपाल कृष्ण के हाथों मारा जाता है, तो कृष्ण के बाएं हाथ की अंगुली से खून बहता देख द्रोपदी बेहद दुखी होती है और वह अपने साड़ी के पल्लू को फाड़ कर कृष्ण के अंगुली में बांध देती है तभी कृष्ण द्रोपदी को अपनी बहन मान लेते हैं और भरी सभा में जब द्रोपदी का चीरहरण होता है तब कृष्ण अपने भाई धर्म का मान रखते हुए द्रोपदी की लाज बचाते हैं।

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