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गांवों में बसती थी प्रेमचंद की आत्मा

Chandauli Updated Tue, 31 Jul 2012 12:00 PM IST
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चंदौली। अंधविश्वास, सूदखोरी, नशाखोरी, दलित उत्पीड़न और गरीब मजदूरों की व्यथा मुंशी प्रेमचंद के साहित्य का केंद्रीय विषय रहा। उनके जैसा कथाकार वर्तमान में भी उतना ही पढ़ा जाता है जितना पहले पढ़ा जाता था। मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी। उनकी आत्मा गांवों में बसती थी। तभी तो उनकी कथाओं के चर्चित पात्र होरी, घीसू, माधव, घसिया की मौजूदगी आज भी समाज में बनी हुई है।
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साढ़े सात दशक के लंबे अंतराल में गांव की तस्वीर तो बदली। कच्चे मकानों की जगह बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं, बैलों की जगह ट्रैक्टर व तांगों की जगह महंगी काराें ने ले ली है। परंतु सोच में आज भी कोई बदलाव नहीं हुआ। गांव के गरीब किसान घुरहू, मुन्नर, कुसई, जमालू आदि में प्रेमचंद्र का होरी व घीसू आज भी जिंदा हैं, जिन्हें सूदखोरों के सूद भरने के लिए अपने बच्चों का निवाला छीनना पड़ता है। मुंशी जी की ‘झूठ कहानी का पात्र बुधुआ अनपढ़ था इसलिए वह अंधविश्वासी भी था। परंतु आज अनपढ़ ही नहीं अपने को ज्यादा शिक्षित बताने वाले भी अंधविश्वास में जी रहे हैं। झाड़ फूंक से रोगों का इलाज कराने वाले अंधविश्वासी आज भी ओझा सोखा के यहां भारी संख्या में जुटते हैं। मुंशी प्रेमचंद्र हिंदी साहित्य के शेक्सपीयर थे। उनको समझने का अर्थ भारतीयता को समझना है। बबुरी के डा. वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं सत्ता और सामंत के बीच शब्दों का आक्रामक विरोध मुंशी जी ने ही किया। मुंशी जी एक ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने पंचपरमेश्वर, गुलेरी की कहानी, हीरा मोती, जैसी तमाम रचना की है जो समाज में व्याप्त कुरीतियों और छुआछूत को हटाने में कारगर साबित हो सकती हैं। उनका कोई ऐसा साहित्य नहीं था जो प्राथमिक से लेकर उच्च कक्षाओं में न पढ़ाया जाता हो। डा. सिंह ने कहा कि प्रेमचंद की उपेक्षा कभी भी समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता।

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