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नया नहीं है वन क्षेत्र में तेंदूपत्ता तस्करी का शगल

Chandauli Updated Sat, 09 Jun 2012 12:00 PM IST
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चकिया। काशी वन्यजीव प्रभाग के जंगलों से तेंदूपत्ता तस्करी का शगल उतना ही पुराना है, जितना संग्रहण अभियान। वन क्षेत्र में सक्रिय तस्कर संग्रहण अभियान के साथ ही सक्रिय होते हैं। इसके बाद पत्ता खरीदवा कर तस्कर अपने खास लोगों के घरों में रखवाते हैं। उत्तर प्रदेश वन विभाग से अधिक मूल्य पर पत्ता खरीद कर उसे वन विभाग और पुलिस की मदद से वाराणसी, मिर्जापुर, गाजीपुर, जौनपुर के स्टाकिस्ट तक पहुंचाते हैं।
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चंद्रप्रभा वन्यजीव विहार में बुधवार की सुबह तेंदूपत्ता की तस्करी का मामला प्रकाश में आने से एक बार फिर तस्करी का मामला गहरा गया है। इसकेसाथ ही वन्यजीव प्रभाग में तस्करी रोकने के सारे दावे विफल हो गये । वैसे वन प्रभाग में तस्करी का मामला काफी पहले से ही जारी है। जानकारों का कहना है कि पहले तेंदूपत्ता के जंगल ठेकेदारों को नीलाम किए जाते थे। लेकिन उसे तोड़ने जैसे श्रम साध्य में ठेकेदार मजदूरों का शोषण करने लगे। इससे उत्तर प्रदेश वन विभाग ने संग्रहण अभियान अपने हाथ में ले लिया। लेकिन उसके बाद बड़े तेंदूपत्ता कारोबारियों केखास लोग सक्रिय हो गये। तोड़ाई के दौरान ही तस्कर वन निगम से अधिक मूल्य देकर पत्ता अपने खास वनवासियों केघरों में स्टाक करा देते हैं। वन निगम के निकासी के दौरान या निकासी बंद होने के बाद बरसात के सीजन में घरों के पत्ते वाहनों के जरिये पुलिस और वन विभाग को सुविधा शुल्क देकर बाजारों में आसानी से पहुंचा देते हैं। भारतीय वन अधिनियम में संशोधनों के बाद से पत्ता की तस्करी में लगे वाहनों को सीज कर उसे राज्य सरकार की संपत्ति घोषित किए जाने का कानून पास हो जाने केबाद से कई वाहन अधिगृहित किए गये हैं। जिससे तस्करी में कमी आयी है, लेकिन अभी भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई है।

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