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काशी नरेश के ऐतिहासिक किला को सहेजने की जरूरत

Varanasi Bureauवाराणसी ब्यूरो Updated Fri, 19 Apr 2019 12:43 AM IST
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चकिया। नगर के दक्षिणी भाग में स्थित काशी नरेश का ऐतिहासिक किला ऐतिहासिक धरोहरो में शामिल हैं। इस किले का निर्माण 1746 ईस्वी में तत्कालीन काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह ने रामनगर के किले के साथ कराया था। पत्थरों की चाहरदीवारी से घिरा यह किला स्थापत्य की दृष्टि से भी महत्व रखता है।
किले का मुख्य द्वार पहले लकड़ी का बना था। इसे अब बदलकर लोहे का कर दिया गया है। परकोटानुमा किले के मुख्य द्वार के ऊपर बारादरी का निर्माण किया गया है। कहा जाता है कि चकिया के किसी भी उत्सव के दौरान राजा वही बैठकर उत्सव का आनंद उठाते थे। किले के अंदर खूबसूरत बगीचा के बीच राजा का महल स्थित है। इस महल की दीवारों पर सुतली की सहायता से रंग बिरंगी पेंटिंग की गई है। दीवारों पर जंगली जानवरों के सिंगो को स्थापित किया गया है। राजा के मुख्य महल के पश्चिमी ओर बारादरी है। वहीं महल के दक्षिणी ओर विशाल सूर्य घड़ी एवं रंगीन मछलियों का छोटा तालाब है। इसके पीछे राजा के मंत्रियों, मनसबदारों तथा कर्मचारियों एवं सैनिकों के आवास बने हैं। वर्तमान में इन आवासों को तोड़कर उसमें महारानी जयंती कुवंरि कन्या इंटर कालेज संचालित है। किले के अंदर स्थित हमाम में राजा के स्नान का बंदोबस्त था तथा बगल में स्थित कुएं में औषधीय जलीय पौधो को उगाया गया था। कुएं का पानी स्वास्थ्य दृष्टि से उत्तम माना जाता है। काशीराज के शासन काल के दौरान की रौनक अब नही दिखाई देती तथा मरम्मत के अभाव में किला की स्थिति खराब है।


शिकारगंज। बारहवीं शताब्दी के आरंभिक चरण में दिल्ली के पास स्थित कन्नौज में गहरवार वंश की स्थापना हुई। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा चंद्रसेन तथा जयचंद हुए थे। कन्नौज में मुस्लिम शासकों के उदय के बाद गहरवारों ने कन्नौज से पलायन किया तथा काशी राज्य में चन्द्रप्रभा नदी के किनारे सुदृढ़ किले का निर्माण किया तथा किले के आस-पास नगर भी बसाया। इस किले तथा नगर के ध्वंशावशेष आज भी चंद्रप्रभा नदी की घाटियों में पाए जाते हैं।
चंद्रप्रभा नदी के किनारे स्थित मुजफ्फरपुर, कुण्डा हेमैया, पुरानाडीह के अलावा विंध्य पर्वत क्षेत्र के पहाड़ो के किनारे गहरवार वंश के अवशेष फैले हुए है। इसमें लाल दरवाजा, बड़की महलियां, छोटकी महलिया के अवशेष आज भी प्राप्त होते है। मुस्लिम शासन का दबाव होने पर बाद के गहरवार राजाओं ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। इसी कारण लाल दरवाजा पर उर्दू में लिखे शिलालेख पाये जाते हैं। वहीं आस-पास के क्षेत्रों में चक्र, शंख, उत्कीर्ण पत्थर के तमाम टुकड़े क्षेत्र में बिखरे हुए हैं। क्षेत्रीय लोगों के अनुसार रामपुर भभौरा गांव के कुरदेवा पहाड़ से लेकर अहरौरा बांध तक गहरवार वंश के अवशेष जगह-जगह प्राप्त होते हैं। गहरवारों द्वारा बनवाये गये अष्टकोणीय कुएं आज भी इस क्षेत्र के तमाम गांवों में पाए जाते हैं।

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