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किसान ने तैयार किया जीरो बजट खेती का रोल मॉडल

अमर उजाला ब्यूरो/बिजनौर Updated Wed, 22 May 2019 11:12 PM IST
गन्ने की फसल देखते गन्ना अधिकारी व किसान।
गन्ने की फसल देखते गन्ना अधिकारी व किसान। - फोटो : अमर उजाला
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बिजनौर में गन्ना किसान अंकुल कुमार जिले के किसानों के लिए जीरो बजट खेती का रोल मॉडल हैं। अंकुल ने खेत में रासायनिक खाद व पेस्टीसाइड का प्रयोग बिल्कुल बंद कर दिया है और जैविक खेती को अपनाया है। जैविक खेती से पैदा हुआ गन्ना रासायनिक खेती से अधिक निकल रहा है।
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गांव बाटपुरा निवासी किसान अंकुल कुमार के खेत में पांच साल पहले महाराष्ट्र के कुछ वैज्ञानिक आए थे। उन्होंने अंकुल को  जैविक विधि से खेती करने को प्रेरित किया। इससे खेत में रासायनिक खाद नहीं डालना  होता और रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च की बचत होती है, इसलिए इसे जीरो बजट की  खेती कहते हैं। अब अंकुल अपने खेतों में केवल जैविक विधि से खेती करते हैं। उनका यह मॉडल अब गांव के दूसरे  किसान भी अपनाने लगे हैं। अंकुल के खेत में 78 से 82 क्विंटल प्रति बीघा की औसत से गन्ना  निकल रहा है। फसल में कोई बीमारी भी नहीं आती है। रसायन का प्रयोग न करने से अंकुल के खेत की मिट्टी में केंचुओं की भरमार है।
बरसात में उनके खेत में इतने केंचुए मिट्टी के ऊपर आ जाते हैं कि पैर रखने की जगह नहीं  बचती है।

केंचुओं से बनाते हैं खाद
अंकुल अपने खेत में केंचुओं से बर्मी कंपोस्ट खाद बनाते हैं। इसके अलावा खेतों में बैक्टिरिया वाला डी कंपोजर का पानी डाला जाता है। बैक्टिरिया खेत में फसलों के अवशेष को गला कर उसका खाद बनाकर फसलों को देते हैं। साथ ही वायुमंडल में मौजूद पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
खुद बनाया कीटनाशक
खेतों में कीटों को खत्म करने के लिए कीटनाशक भी खुद ही बनाया। गोमूत्र में नीम, अरंडी व शीशम के पत्ते, धतूरा, लहसुन, हरी मिर्च, तंबाकू व कुछ घास डाली। इस घोल में पांच छह दिन में खुजली पैदा करने वाले बैक्टिरिया पैदा हो जाते हैं। इसे शरीर से बचाकर पौधों पर स्प्रे किया जाता है।
किसान अपनाएं जीरो बजट खेती
जिला गन्ना अधिकारी यशपाल सिंह के अनुसार अंकुल कुमार जैविक विधि से गन्ने की अच्छी पैदावार ले रहे हैं। बाकी किसानों को भी जीरो बजट खेती को अपनाना चाहिए।
होती है बंपर बचत
एक बीघा गन्ने में किसान औसतन डेढ़ से दो हजार रुपये के रासायनिक खाद, पेस्टीसाइड आदि डालते हैं। जैविक खेती में इस सबकी बचत होती है। जैविक खेती केवल बैक्टिरिया की मदद से की जाती है।

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