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दस वर्ष में नहीं किया पौधरोपण

Bijnor Updated Sat, 09 Feb 2013 05:30 AM IST
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बिजनौर। वातावरण में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन छोड़ने वाले वृक्ष पीपल का अस्तित्व आस्था, प्रतिबंध और लाभ हानि के चक्रव्यूह में उलझ गया है। धर्मग्रंथ व वैज्ञानिक भले ही पीपल के पेड़ को पर्यावरण के लिए वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ बता रहे हों, लेकिन वन विभाग के लिए पीपल कोई मायने नहीं रखता है। यही वजह है कि पिछले दस वर्ष में जहां विभिन्न प्रकार के 20 लाख से भी अधिक पौधों का रोपण किया गया है, वहीं पीपल से वन विभाग ने किनारा कर लिया है। माना जा रहा है कि पीपल को काटने पर प्रतिबंध व इसकी लकड़ी इमारती नहीं होने के कारण वन विभाग पीपल के पेड़ से बच रहा है।
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पीपल का पेड़ अन्य वृक्षों के मुकाबले वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर दो गुनी ऑक्सीजन देता है। वैज्ञानिक स्तर पर भी यह प्रमाणित हो चुका है। यही वजह है कि पीपल के वृक्ष को काटने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध है। ज्योतिषाचार्य डा. अरविंद शर्मा के अनुसार पीपल का वृक्ष हर समय ऑक्सीजन देता है। पर्यावरण में सबसे ज्यादा लाभप्रद होने के कारण पीपल के संरक्षण के लिए ही इस वृक्ष को धर्म से भी जोड़ा गया है। धर्मग्रंथों में पीपल के पेड़ को काटने, जलाने आदि को निषेध बताया गया है और पीपल को देवता की संज्ञा दी गई है। पीपल के छोटे पत्ते पीलिया और सर्प विष के इलाज में भी काम आते हैं।

उधर, वन विभाग की दृष्टि में पीपल का पौधरोपण घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इसकी वजह पीपल के पेड़ को काटने पर प्रतिबंध, पीपल की लकड़ी इमारती नहीं होना है। लाभ पाने की चाहत में वन विभाग ने पीपल के पौधरोपण से पूरी तरह से किनारा कर लिया है। प्रति वर्ष दो से ढाई लाख पौधे आम, शीशम, जामुन, अर्जुन, अशोक, नीम आदि के रोपित किए जा रहे हैं, लेकिन पीपल पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिले में पीपल के वृक्षों का भी वन विभाग के पास कोई आंकड़ा नहीं है।
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इमारती व औषधीय पौधे हर साल लगाए जा रहे हैं। पौध कम होने के कारण पीपल कम संख्या में लगाया जा रहा है।
- विजय कुमार, डीएफओ

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