पंडित जी की सभी लाइनें व्यस्त हैं

Bijnor Updated Sun, 30 Sep 2012 12:00 PM IST
बिजनौर। श्राद्धपक्ष शुरू होते ही पंडितों की व्यस्तता बढ़ गई है। एक दिन पहले से ही लोगों ने कर्मकांड कराने वाले ब्राह्मणों की बुकिंग कर दी है। अहम बात ये है कि ज्यादातर पुराने ब्राह्मण ही श्राद्ध संपन्न करवा रहे हैं। युवा इस काम में रुचि नहीं ले रहे हैं। इसलिए पंडितजी ढूंढे नहीं मिल रहे हैं।
लगभग साढ़े तीन महीने तक खाली रहने वाले पंडित एक बार फिर से व्यस्त हो गए हैं। श्राद्धपक्ष शुरू होते ही उनकी डिमांड भी बढ़ गई है। 17 दिन तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है, कर्मकांड भी पंडित ही संपन्न कराते हैं। ब्राह्मणों की बुकिंग शनिवार से ही शुरू हो गई थी। फोन पर ही लोग अपने-अपने ब्राह्मण को बुक करने में लगे हैं। ब्राहमण भी यजमान को फिक्स समय दे रहे हैं। ब्राह्मणों ने दिन भर के काम को लेकर दिनचर्या बना ली है। पंडित की व्यवस्तता का कारण नई पीढ़ी का इस कार्य को नहीं करना माना जा रहा है। पुराने पंडित जी ही परंपरागत कार्य कर रहे है। नई पीढ़ी अन्य व्यवसाय में कैरियर बना रही है। मधुसूदनपुर निवासी पंडित बाबूराम शर्मा के अनुसार उनके तीन बेटे हैं। एक फोटोग्राफर है, दूसरा प्रेस मैकेनिक, तीसरा बेटा एमआर है। बस वे खुद ही इस काम को कर रहे हैं। वे भी मानते हैं कि नई पीढ़ी इस काम में रुचि नहीं ले रही है।
नहीं दिखाई देते भोजन भट्ट
बिजनौर। अब भोजन भट्ट अब नहीं दिखाई देते हैं। पहले भोजन भट्ट खाने को लेकर चर्चाओं में रहते थे, लेकिन अब भोजन नहीं केवल भोग की तरह ही खाना खाते हैं। अतिव्यस्तता और कई जगहों पर भोजन खाने के कारण पंडित अधिक भोजन न खाकर चख लेते हैं और बाकी भोजन अपने साथ ले जाते हैं।
गायब हो गईं गाय और दूध
गाय और दूध दोनों की ही किल्लत बढ़ रही है। पहले हर घर में एक गाय पाली जाती थी, जिसे हर रोज भोजन का एक हिस्सा निकालकर खिलाया जाता था। अब शहर को छोड़िए गांवों में भी गाय कम ही रह गईं हैं। शहरों में लावारिस भी अब नहीं दिखाई देतीं। गाय की अपेक्षा लोग भैंसों का पालन कर रहे हैं। पहले सुबह हर घर पर शहरों में गाय जाती थी, सभी लोग गाय के लिए भोजन दरवाजे पर रखते थे, लेकिन अब श्राद्ध में भोजन कराने के लिए भी गाय को तलाशा जा रहा है।
कौंवों के अस्तित्व को भी खतरा
खेतों में पेस्टीसाइड का जबरदस्त तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। जिससे पक्षियों के अस्तित्व पर खतरा मंडाराने लगा है। कौवे भी इससे अछूता नहीं रहा है। मक्का की कुकड़ी, बाजरे की कुकड़ी, धान सभी पर पेस्टीसाइड का इस्तेमाल हो रहा है। वन विभाग के अधिकारी भी कौवे लुप्त होने की वजह पेस्टीसाइड को ही मान रहे हैं।
भूखे को भी कराएं भोजन
ज्योतिषाचार्य आरके शर्मा बताते हैं कि कौवे और गाय न मिलने की स्थिति में गौशाला या मंदिर में भोजन पहुंचाया जा सकता है। भूखे को भी भोजन खिलाया जा सकता है। उड़द की दाल श्राद्ध में भोजन कराने के लिए सर्वोत्तम है। ब्राह्मणों को भोजन कराते समय सफेद और पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पहले दिन अगर गाय न मिले तो अगले दिन भी गाय को भोजन खिलाया जा सकता है। गाय का भोजन पहले ही अलग से निकालकर रख दें।

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