विकास पर लगेगा ब्रेक

Bijnor Updated Fri, 29 Jun 2012 12:00 PM IST
बिजनौर। जिला पंचायत की चेयरपर्सन नसरीन सैफी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाने से जहां विपक्षी खेमे में खुशी की लहर है, वहीं जिला पंचायत के जरिए होने वाले विकास कार्याें की रफ्तार पर ब्रेक लगना लाजिमी है। उधर, जिला पंचायत की कुर्सी पर अस्थिरता आने से अधिकारियों, कर्मचारियों तथा ठेकेदारों के चेहरे जर्द हो गए हैं।
जिला पंचायत के अधिकारियों तथा कर्मचारियों की चिंता का मुख्य कारण जिला पंचायत अध्यक्ष पद का रिक्त हो जाना है। अध्यक्ष पद रिक्त हो जाने के कारण वेतन तक के भुगतान पर संकट आएगा और भुगतान बिल भी रुक जाएगा। जिला पंचायत में अधिकतर कार्य चेयरमैन व एएमए के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है। इससे पूर्व की व्यवस्था में जिला पंचायत उपाध्यक्ष होता था, जिसे अध्यक्ष के हटने पर कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया जाता था, लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है। शासन से ही डीएम को प्रशासक बनाया जाएगा या तीन जिला पंचायत सदस्यों की एक समिति बनाई जाएगी, जो अध्यक्ष पद के कार्यों का निर्वहन करेगी। दोनों ही स्थितियों में समय लगना स्वाभाविक है। पिछली बार तत्कालीन चेयरपर्सन रुचि वीरा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद जिलाधिकारी को प्रशासक नियुक्त करने में प्रदेश शासन को छह माह लग गए थे, जिस कारण जिला पंचायत के कर्मचारियों, अधिकारियों को वेतन तक नहीं मिल पाया था और विकास कार्य भी प्रभावित हुए थे।
सपा से ही शुरू हुआ था अविश्वास प्रस्ताव का खेल
पहले भी कई जिला पंचायत अध्यक्ष की छिन चुकी है कुर्सी
सत्ता पक्ष की पार्टी में जाने के बाद नहीं बची कुर्सी
बिजनौर। अविश्वास प्रस्ताव पास करने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष नसरीन सैफी को हटाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व भी कई जिला पंचायत अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटाया जा चुका है। जिले के अंदर सपा सरकार में ही अविश्वास प्रस्ताव लाकर जिला पंचायत अध्यक्ष को हटाने की परंपरा शुरू हुई थी। खास बात यह है कि जिले में सत्ता के साथ ही जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी भी बदल जाती है।
जिले में सबसे पहले वर्ष 1998 में जिला पंचायत अध्यक्ष जमील अहमद को प्रदेश की सरकार बदलने के बाद कुर्सी गंवानी पड़ी थी। बसपा के समर्थन से जमील अहमद जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे, लेकिन सूबे में सपा की सरकार बनने के बाद उन्हें अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटा दिया गया था। तभी से जिले में अविश्वास प्रस्ताव की पंरपरा शुरू हुई। इसके बाद वर्ष 2009 में रालोद से तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्षा रुचि वीरा के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाकर उसे हटा दिया गया था। कुर्सी बचाने के रुचिवीरा रालोद से बसपा में भी गई, लेकिन कोई फायदा नहंी हुआ। उनके स्थान पर बसपा की गायत्री पाराशर चेयरपर्सन बनी थी। बसपा सरकार में ही गायत्री पाराशर के बाद नसरीन सैफी जिला पंचायत अध्यक्ष बनी, लेकिन अब सूबे की सरकार बदल गई। सपा सरकार आने के बाद फिर से वहीं खेल हुआ जिसका कयास लगाया जा रहा था। नसरीन सैफी को भी सूबे की सत्ता के साथ ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। कुर्सी बचाने के लिए नसरीन सैफी ने भी पार्टी बदलकर साइकिल की सवारी, लेकिन उनकी हरसत पूरी नहीं हो पाई। अब सबकी नजर सपा पर टिकी है। कयास बाजी शुरू हो गई है कि इस बार सपा किस पर मेहरबान होगी।
क्या रहेगी प्रक्रिया
बिजनौर। जिला पंचायत अध्यक्ष नसरीन सैफी के खिलाफ पास हुए अविश्वास प्रस्ताव को राज्य सरकार को भेजा जाएगा। राज्य सरकार की ओर से जिला पंचायत की वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी। इसमें तीन सदस्यों की कमेटी गठित करके उन्हें भी कार्यभार सौंपा जा सकता है या डीएम को प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है। इसके बाद राज्य सरकार की हरी झंडी मिलने पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। जिला पंचायत अध्यक्ष नसरीन सैफी भी दोबारा से चुनाव लड़ सकती है। उन पर चुनाव लड़ने का कोई प्रतिबंध नहीं है।

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